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Tissue Paper और कलम

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शिखरों के पार

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हृदय को अकुलाता ये विचार है,
दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है,
बसता क्या शिखरों के उस पार है।

उठती अब तल से चीख पुकार है,
करती जो अंतः में चिंघाड़ है,
छुपा क्या शिखरों के उस पार है।

हृदय को नहीं ये स्वीकार है,
क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है ,
जाने क्या शिखरों के उस पार है।

तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है,
भू पर धरोहर का अंबार है,
देखो क्या शिखरों के उस पार है।।
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शब्दों का हठ

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शब्दों ने क्यूँ आज न जाने
भुरभुरा सा एक रूप धरा है,
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है,
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है,
आज अनुपम कुछ करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है।

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है स्वप्न से बनना,
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं।
कहते हैं मुझसे कि एक
थिरकती लौ की आस सा बनना,
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं।

कविताओं के छंद बना जब
पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा,
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र से मैंने फैलाना चाहा,
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर।

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है,
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा नई गढ़ना है,
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है,
शायद, उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है।।

 

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अरण्य का फूल

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बेलों लताओं और डालियों
पर सजते हैं कितने,
रूप रंग सुरभि से शोभित
कोमल हैं ये उतने।

असंख्य खिलते हैं यहाँ
और असंख्य मुरझाते हैं,
अज्ञात और अविदित कितने
धूल में मिल जाते हैं।

दो दिन की ख्याति है कुछ की
दो दिन पूजे जाते,
फिर कोई न पूछे उन्हें
जो वक्ष पर मुरझा जाते।

जग रमता उसी को है
जो फल का रूप है धरता,
अरण्य का वो फूल मूल
जो पेट किसी का भरता।।

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काव्य नहीं बंधते

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शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं,
स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते।
हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं,
किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते।
मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ,
पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते।
उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

अंतः में अटखेलियाँ तो भाव करते हैं,
किन्तु बन अभिव्यक्ति वो मुझसे नहीं रिसते।
ले निरंतर रूप वो मुझसे नहीं बहते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

न कोई ज़ंजीर न बाधा की बंदी मैं,
मनस से क्यों उदित हो तब काव्य नहीं बंधते।
साहित्य के नव संस्करण का पथ नहीं गढ़ते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

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शब्दों का हठ

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शब्दों ने आज न जाने क्यूँ
भुरभुरा सा एक रूप धरा है।
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है ।
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है ।
आज कुछ अलग करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है ॥

कविताओं की छंद बना जब
पतंग से मैंने उड़ाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर ।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र सा  मैंने फैलाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर ॥

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है आस से बनना ।
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं ।
कहते हैं मुझसे कि एक
फकीर की है दुआ सा बनना ।
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं ॥

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है ।
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा एक नई गढ़ना है ।
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है ।
शायद उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है ॥

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कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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पतझड़

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कल्पना करो, कुछ दिनों में
ये बंजर हो जायेंगे।
ये हवा के संग लहलहाते पत्ते,
अतीत में खो जायेंगे॥

जब बारिश की बूंदों में
ये पत्ते विलीन होंगे।
क्या अश्रु में लिप्त
तब ये कुलीन होंगे?

विरह की ज्वाला में क्या
ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे?
या नवजीवन की प्रतीक्षा में
यूँही अटल रहेंगे?

क्या हवा के थपेड़ों में
झुक कर, टूट मरेंगे?
या चिड़ियों के घोंसलों का
फिर ये आशियाँ बनेंगे?

शायद, यूँहीं,
सभ्यताओं का अंत होता है।
या शायद,आरम्भ ही
इस अंत के परांत होता है॥

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ईर्ष्या या प्रेम

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https://www.emaze.com/@AFTOILZR/Muscle-Short-Story

मैं कथा कहूँ दो प्रेमियों की
जो सदा संग ही विचरते थे ।
पर एक-दूजे से बिना मिले
निर्बल से, अाहें भरते थे ॥

एक शाम अनोखी की बात हुई
ईर्ष्या से प्रेमिका हताश हुई ।
सूची शिकायतों की खोली
प्रेमी से अथाह निराश हुई ॥

मायोसिन:
‘तू कहता तुझे मैं हूँ पसंद
फिर क्यूँ सबसे अाकर्षित तू?
तू अर्थ इस मैत्री का अब बता
है किस मिट्टी से निर्मित तू?’

एक्टिन:
‘अाकर्षण? अाखिर वो क्या है?
मेरे भाव तो सारे सम्मुख हैं ।
हे प्रिय! तू मेरी बात समझ
मैं तेरी ओर ही उन्मुख हूँ ॥

क्यों भूमिका मेरी न समझे तू?
मैं तो बस एक संबंधक हूँ ।
लक्ष्य तो मेरा उर्जा-जनन
बस पात्र रूपी मैं दर्शक हूँ ॥

तुझसे ही पाकर शक्ति मैं
दूजों तक हाथ बढ़ाता हूँ ।
फिर जोड़ के सारे कण-कण मैं
कोशिका का रूप बनाता हूँ ॥

कोशिकांगों को स्थिरता मिलती है
मेरे यूँ हाथ पकड़ने से ।
फिर क्यूँ उलाहना करती हो
तुम झूठ-मूठ आकर्षण के ?’

मायोसिन:
‘हर चाल मैं तेरी समझती हूँ
ये कहानियाँ मुझे तू न ही सुना !
सम्बन्धन के विचित्र अाड़ में तू
करता पूरा अपना सपना॥’

एक्टिन:
‘सपना मेरा तो तुम ही हो
इस बात को क्यों न समझती हो?
मैं सदा रहा हूँ साथ तेरे
फिर भी ये प्रश्न तुम करती हो !

कोशिकाओं का मैं ढाँचा हूँ
इस बात से हो न अवगत तुम?
कण-कण को जोड़ के ढाँचा बने
फिर क्यों मुझसे हो क्रोधित तुम?

संगठन का ही तो कार्य मेरा
मैं जोड़ू नहीं तो क्या मैं करूँ?
प्रयोजन जो मेरा कोशिका में
बिन हाथ धरे कैसे पूर्ण करूँ?’

मायोसिन:
‘समझती हूँ प्रयोजन मैं तेरा
पर द्वेष मैं कैसे दूर करूँ?
ये प्रेम जो तेरा समानांतर है
उसे छल नहीं तो क्या समझूँ?’

एक्टिन:
‘हे प्रिय समझो मेरी दुविधा को
ये छल नहीं, ये धर्म मेरा ।
संभाल के सबको रखना ही
है प्रथम लक्ष्य और कर्म मेरा ॥

मैं करूँ कुछ भी, जाऊँ मैं कहीं
न छोड़ूं तेरा मैं हाथ कभी ।
कोशिका-कोशिका या कोशिका-धरा
हर मिलन में तू ही साथ रही ॥

जब ऊर्जा मुझको पानी थी
तू ही तो संग मेरे खड़ी रही ।
पूरक हैं हम एक दूजे के
तुझ बिन मुझ में शक्ति ही नहीं ॥

समझता हूँ मैं तेरी ईर्ष्या को
तेरे प्रेम का भी अाभास करूँ ।
इसलिए तो तेरे संग ही मैं
कोशिका का रूप विन्यास करूँ?

अब उठो हे प्रिय! न रूठो तुम
कि व्यर्थ ये सारा क्रन्दन है ।
कोशिकाओं की क्षमताओं का
आधार हमारा बंधन है ॥

मायोसिन:
तुम ठीक ही कहते हो हे प्रिय!
कि असीम प्रेम हम में लय है ।
फिर भी न जाने क्युँ मुझमें
इसकी असुरक्षा का भय है ॥

एक्टिन:
वो प्रेम कहाँ भला प्रेम हुअा
जिसमे ईर्ष्या न व्याप्त हुई ।
तनाव प्रेम का जहाँ रुका
समझो, अवधि भी समाप्त हुई ॥

निराश न हो हे प्रिय तुम यूँ
ईर्ष्या से ऊर्जा निर्मित होगी ।
फिर ऊर्जा के हर कण-कण से
कोशिका अपनी विकसित होगी ॥

कि प्रेम ये अपना ऐसा है
जो विकास का मूल आधार बने ।
कि इसी प्रेम की दीवारों से
संगठित कोशिका का संसार सजे ॥

सन्दर्भ – यह कविता मैंने अपने शोध के नए विषय से प्रभावित होकर लिखी है। कोशिकाओं में कई प्रोटीन्स होते हैं जो कोशिका का ढाँचा (skeleton) बनते हैं। उनमें से दो प्रोटीन्स हैं: एक्टिन और मायोसिन। कोशिका में एक्टिन के फिलामेंट्स होते हैं जो मायोसिन के हेड से जुड़ते हैं । ATP की सहायता से मायोसिन का हेड एक निर्धारित दिशा में घूमता है और एक्टिन का फिलामेंट उसके साथ विस्थापित होता है। इस विस्थापन के से कोशिका से सिकुड़ती या फैलती है। कोशिका की कई प्रक्रियाएँ इसी घटना से नियंत्रित हैं।
इन दोनों प्रोटीन्स का मानवीकरण कर के मैंने यह काव्य लिखा है। यहाँ एक्टिन और मायोसिन को मैंने प्रेमियों के रूप में प्रस्तुत किया है। चूँकि प्रक्रियाओं के को पूर्ण करने के लिए एक्टिन(प्रेमी) कई दूसरे प्रोटीन्स से जुड़ता है, मायोसिन (प्रेमिका) एक दिन उससे नाराज़ हो जाती है। इसी ईर्ष्या में मायोसिन एक्टिन को शिकायत करती है कि वो ऐसा क्यों करता है। और एक्टिन इस व्यवहार को स्पष्ट करता है। ये कविता इन दोनों के इसी संवाद पर आधारित है।

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बढ़ चलें हैं कदम फिर से

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छोड़ कर वो घर पुराना,
ढूंढें न कोई ठिकाना,
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।

ऊंचाई कहाँ हैं जानते,
मंज़िल नहीं हैं मानते।
डर जो कभी रोके इन्हें
उत्साह का कर हैं थामते।

कौतुहल की डोर पर
जीवन के पथ को है बढ़ाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

काँधे पर बस्ता हैं डाले,
दिल में रिश्तों को है पाले।
थक चुके हैं, पक चुके हैं,
फिर भी पग-पग हैं संभाले।

खुशियों की है खोज
कि यात्रा तो बस अब है बहाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

जो पुरानी सभ्यता है
छोड़ कर पीछे उन्हें अब।
किस्से जो बरसों पुराने
बच गए हैं निशान से सब।

की नए किस्सों को पग-पग
पर है अपने जोड़ जाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

कोई कहे बंजारा तो
बेघर सा कोई मानता है।
अनभिज्ञ! अज्ञात से परिचय
का रस कहाँ जानता है।

जोड़ कर टूटे सिरों को,
विश्व अपना है रचाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

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