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Tissue Paper और कलम

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Thoughts

कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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पत्तों की बरसात

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आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ।
अंगड़ाई लेती थी सुबह
औंधी गहरी रात हुई थी ॥

पक्षी भी सारे अब चुप थे,
घोंसलों में बैठे गुमसुम थे,
कैसी ये घटना उनके संग
यूँही अकस्मात् हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

सूरज की अब धूप भी नम थी,
तपिश भी उसमें थोड़ी कम थी,
स्थिति बनाती और गहन तब
तेज़ हवा भी साथ हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

शर्म छोड़ सब पेड़ थे नंगे,
टेढ़े मेढ़े और बेढंगे,
झड़प हुई थी उनमें या कि
पत्तों की बरसात हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

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पतझड़

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कल्पना करो, कुछ दिनों में
ये बंजर हो जायेंगे।
ये हवा के संग लहलहाते पत्ते,
अतीत में खो जायेंगे॥

जब बारिश की बूंदों में
ये पत्ते विलीन होंगे।
क्या अश्रु में लिप्त
तब ये कुलीन होंगे?

विरह की ज्वाला में क्या
ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे?
या नवजीवन की प्रतीक्षा में
यूँही अटल रहेंगे?

क्या हवा के थपेड़ों में
झुक कर, टूट मरेंगे?
या चिड़ियों के घोंसलों का
फिर ये आशियाँ बनेंगे?

शायद, यूँहीं,
सभ्यताओं का अंत होता है।
या शायद,आरम्भ ही
इस अंत के परांत होता है॥

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ईर्ष्या या प्रेम

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https://www.emaze.com/@AFTOILZR/Muscle-Short-Story

मैं कथा कहूँ दो प्रेमियों की
जो सदा संग ही विचरते थे ।
पर एक-दूजे से बिना मिले
निर्बल से, अाहें भरते थे ॥

एक शाम अनोखी की बात हुई
ईर्ष्या से प्रेमिका हताश हुई ।
सूची शिकायतों की खोली
प्रेमी से अथाह निराश हुई ॥

मायोसिन:
‘तू कहता तुझे मैं हूँ पसंद
फिर क्यूँ सबसे अाकर्षित तू?
तू अर्थ इस मैत्री का अब बता
है किस मिट्टी से निर्मित तू?’

एक्टिन:
‘अाकर्षण? अाखिर वो क्या है?
मेरे भाव तो सारे सम्मुख हैं ।
हे प्रिय! तू मेरी बात समझ
मैं तेरी ओर ही उन्मुख हूँ ॥

क्यों भूमिका मेरी न समझे तू?
मैं तो बस एक संबंधक हूँ ।
लक्ष्य तो मेरा उर्जा-जनन
बस पात्र रूपी मैं दर्शक हूँ ॥

तुझसे ही पाकर शक्ति मैं
दूजों तक हाथ बढ़ाता हूँ ।
फिर जोड़ के सारे कण-कण मैं
कोशिका का रूप बनाता हूँ ॥

कोशिकांगों को स्थिरता मिलती है
मेरे यूँ हाथ पकड़ने से ।
फिर क्यूँ उलाहना करती हो
तुम झूठ-मूठ आकर्षण के ?’

मायोसिन:
‘हर चाल मैं तेरी समझती हूँ
ये कहानियाँ मुझे तू न ही सुना !
सम्बन्धन के विचित्र अाड़ में तू
करता पूरा अपना सपना॥’

एक्टिन:
‘सपना मेरा तो तुम ही हो
इस बात को क्यों न समझती हो?
मैं सदा रहा हूँ साथ तेरे
फिर भी ये प्रश्न तुम करती हो !

कोशिकाओं का मैं ढाँचा हूँ
इस बात से हो न अवगत तुम?
कण-कण को जोड़ के ढाँचा बने
फिर क्यों मुझसे हो क्रोधित तुम?

संगठन का ही तो कार्य मेरा
मैं जोड़ू नहीं तो क्या मैं करूँ?
प्रयोजन जो मेरा कोशिका में
बिन हाथ धरे कैसे पूर्ण करूँ?’

मायोसिन:
‘समझती हूँ प्रयोजन मैं तेरा
पर द्वेष मैं कैसे दूर करूँ?
ये प्रेम जो तेरा समानांतर है
उसे छल नहीं तो क्या समझूँ?’

एक्टिन:
‘हे प्रिय समझो मेरी दुविधा को
ये छल नहीं, ये धर्म मेरा ।
संभाल के सबको रखना ही
है प्रथम लक्ष्य और कर्म मेरा ॥

मैं करूँ कुछ भी, जाऊँ मैं कहीं
न छोड़ूं तेरा मैं हाथ कभी ।
कोशिका-कोशिका या कोशिका-धरा
हर मिलन में तू ही साथ रही ॥

जब ऊर्जा मुझको पानी थी
तू ही तो संग मेरे खड़ी रही ।
पूरक हैं हम एक दूजे के
तुझ बिन मुझ में शक्ति ही नहीं ॥

समझता हूँ मैं तेरी ईर्ष्या को
तेरे प्रेम का भी अाभास करूँ ।
इसलिए तो तेरे संग ही मैं
कोशिका का रूप विन्यास करूँ?

अब उठो हे प्रिय! न रूठो तुम
कि व्यर्थ ये सारा क्रन्दन है ।
कोशिकाओं की क्षमताओं का
आधार हमारा बंधन है ॥

मायोसिन:
तुम ठीक ही कहते हो हे प्रिय!
कि असीम प्रेम हम में लय है ।
फिर भी न जाने क्युँ मुझमें
इसकी असुरक्षा का भय है ॥

एक्टिन:
वो प्रेम कहाँ भला प्रेम हुअा
जिसमे ईर्ष्या न व्याप्त हुई ।
तनाव प्रेम का जहाँ रुका
समझो, अवधि भी समाप्त हुई ॥

निराश न हो हे प्रिय तुम यूँ
ईर्ष्या से ऊर्जा निर्मित होगी ।
फिर ऊर्जा के हर कण-कण से
कोशिका अपनी विकसित होगी ॥

कि प्रेम ये अपना ऐसा है
जो विकास का मूल आधार बने ।
कि इसी प्रेम की दीवारों से
संगठित कोशिका का संसार सजे ॥

सन्दर्भ – यह कविता मैंने अपने शोध के नए विषय से प्रभावित होकर लिखी है। कोशिकाओं में कई प्रोटीन्स होते हैं जो कोशिका का ढाँचा (skeleton) बनते हैं। उनमें से दो प्रोटीन्स हैं: एक्टिन और मायोसिन। कोशिका में एक्टिन के फिलामेंट्स होते हैं जो मायोसिन के हेड से जुड़ते हैं । ATP की सहायता से मायोसिन का हेड एक निर्धारित दिशा में घूमता है और एक्टिन का फिलामेंट उसके साथ विस्थापित होता है। इस विस्थापन के से कोशिका से सिकुड़ती या फैलती है। कोशिका की कई प्रक्रियाएँ इसी घटना से नियंत्रित हैं।
इन दोनों प्रोटीन्स का मानवीकरण कर के मैंने यह काव्य लिखा है। यहाँ एक्टिन और मायोसिन को मैंने प्रेमियों के रूप में प्रस्तुत किया है। चूँकि प्रक्रियाओं के को पूर्ण करने के लिए एक्टिन(प्रेमी) कई दूसरे प्रोटीन्स से जुड़ता है, मायोसिन (प्रेमिका) एक दिन उससे नाराज़ हो जाती है। इसी ईर्ष्या में मायोसिन एक्टिन को शिकायत करती है कि वो ऐसा क्यों करता है। और एक्टिन इस व्यवहार को स्पष्ट करता है। ये कविता इन दोनों के इसी संवाद पर आधारित है।

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बढ़ चलें हैं कदम फिर से

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छोड़ कर वो घर पुराना,
ढूंढें न कोई ठिकाना,
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।

ऊंचाई कहाँ हैं जानते,
मंज़िल नहीं हैं मानते।
डर जो कभी रोके इन्हें
उत्साह का कर हैं थामते।

कौतुहल की डोर पर
जीवन के पथ को है बढ़ाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

काँधे पर बस्ता हैं डाले,
दिल में रिश्तों को है पाले।
थक चुके हैं, पक चुके हैं,
फिर भी पग-पग हैं संभाले।

खुशियों की है खोज
कि यात्रा तो बस अब है बहाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

जो पुरानी सभ्यता है
छोड़ कर पीछे उन्हें अब।
किस्से जो बरसों पुराने
बच गए हैं निशान से सब।

की नए किस्सों को पग-पग
पर है अपने जोड़ जाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

कोई कहे बंजारा तो
बेघर सा कोई मानता है।
अनभिज्ञ! अज्ञात से परिचय
का रस कहाँ जानता है।

जोड़ कर टूटे सिरों को,
विश्व अपना है रचाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

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सैंतीस केजी सामान

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फोटो सौजन्य: मृणाल शाह

छितराई यादों से अब मैं
सैंतिस केजी छाँटूं कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

बाँध भी लूँ मैं नर्म रजाई
और तकिये को एक ही संग
और लगा कर तह चादर को
रख दूँ उनको एक ही ढंग

बिस्तर की सिलवट से पर मैं
सपनों को छाँटूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

ढेर किताबों की दे दूँ मैं
किसी कनिष्ठ के घर पर भी
बेच मैं दूँ पुस्तिकाऐं अपनी
व्यर्थ सारी समझ कर भी

पर ज्ञान के रस को अब
मैं पन्नों से छानूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

कपड़े पुराने और जूतों को
दान कहीं मैं कर भी दूं
तस्वीरों के संग्रह को मैं
डब्बों में यदि भर भी दूं

पर यात्राओं के अनुभव को
चित्रित कर डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

कागज़ पर लिखे शब्दों को
छपवा दूँ मैं पुस्तक में
मित्रों के उपहारों को
सहेज रखूँ प्रदर्शन में

पर प्रेम के इंद्र-धनुष को
बस्ते में डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

बड़गद से टूटे पत्तों को
रस्ते से मैं चुन भी लूँ
और पुरानी राहों को मैं
आँखों में यदि भर भी लूँ

किन्तु हास से युक्त क्षणों की
आवृत्ति कर डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

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Plastic deformation

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Courtesy: My birthday gift from a few dear friends

Yesterday, while walking,
I wrote some words in ink.
Some were bitter, harsh
Some rosy, lovely, pink.

Some warm and touching,
I poured from my heart.
Some reckless, careless,
Roughly scribbled, apart.

Some truth laden emotions,
Carefully weaved together.
Some shallow, unsettling,
Bound with a tether.

I sprayed my raw ideas.
Brewed them to unwind.
I laid some soft musings
Of a wandering mind.

I also sketched in ink
the faces that I met.
Wrote their names beneath
In case, I forget.

Last night, then, I slept,
Kept my pen aside.
Sleep flushed my writings
Left smudges behind.

Impressions of the nib
Stayed deep and dark.
Memories were tattered
Left was just the mark.

Deformations imbued
deeper inside me.
Shaping the face in mirror
That my eyes will see.

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मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस
चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस

जब चाँद छुपा था बादल में,
था लिप्त गगन के आँगन में,
मैं रात की चादर को ओढ़े
तारों से बातें करती थी ।
मैं नभ के झिलमिल प्रांगण से
सपनों के मोती चुनती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब सूर्य किरण से रूठा था,
प्रकाश का बल भी टूटा था,
मैं सूर्य-किरण के क्षमता की
गाथायें गाया करती थी ।
धागों के बाती बना-बना
जग का अँधियारा हरती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब हरियाली मुरझाई थी,
शुष्कता उनपर छायी थी,
मैं भंगूरित उन मूलों को
पानी से सींचा करती थी ।
पेडों की सूखी छाँवों में
मैं पौधे रोपा करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब ईश्वर भक्त से रुष्ट हुआ,
कर्मोँ पर उसके क्रुद्ध हुआ,
निष्ठा की गीली मिट्टी से
विश्वास का पात्र मैं गढ़ती थी ।
मैं आस की कम्पित लौ से भी
श्रद्धा को प्रज्ज्वल करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

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That silent guitar

1800989

Silently, it lays.
Strings out of tune.
Nothing brings life,
Neither sun, nor moon.

Skin has lost luster,
Lies yellow and pale
Crawlers adorn the gaps
leaving tiny trails.

Discordant, it lays.
Its melody is gone.
Yet the string’s might
wait for the dawn.

Silence is relentless.
This wait is endless.
For touch of those fingers,
for warmth of that caress.

Dusted and dying ,
Lay music inside.
With broken hopes, it laid,
when last night it cried.

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