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Tissue Paper और कलम

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मारीच की खोज

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मैं धरा के जंगलों में
ढूंढता मारीच, देखो !
बिछड़े लक्ष्मण और सीता
मुझसे किस युग में, न पूछो !

एक उसकी खोज में
वर्षों गए हैं बीत मेरे।
अब उपासक बन गए हैं
उसके ही सब गीत मेरे।

मृग बना था स्वर्ण का वह,
किसी युग में ज्ञात मुझको।
अब तो अनभिज्ञ सा मैं
ढूंढता हर पात उसको।

मन है उसका बंधक कि
मोहन में है जीवन बिताये।
किन्तु न अस्तित्व उसका
किसी भी क्षण में जान पाए।

कौन है वह, क्या है कि
वह समक्ष भी है परोक्ष भी है।
पाने से उसको ही, अब तो
तय हुआ मेरा मोक्ष भी है।

वन गगन और पर्वतों पर,
हर दिशा में ढूंढता हूँ।
‘सत्य क्या मारीच की?’
प्रश्न यह ही पूछता हूँ।

थक गया हूँ, चूर हूँ मैं,
मोह से मजबूर फिर भी।
कर दूँ कैसे अंत मैं मारीच,
और इस खोज की भी।

फिर कभी जब देखता हूँ,
मैं जो अपने मन के अंदर।
पाता हूँ मारीचों के
जाने कितने मैं समंदर।

क्या यही अब तथ्य है कि
जब तक हैे जीवंत आशा।
अंत न होगा मनस में,
मारीच की जी है पिपासा।

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शिखरों के पार

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हृदय को अकुलाता ये विचार है,
दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है,
बसता क्या शिखरों के उस पार है।

उठती अब तल से चीख पुकार है,
करती जो अंतः में चिंघाड़ है,
छुपा क्या शिखरों के उस पार है।

हृदय को नहीं ये स्वीकार है,
क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है ,
जाने क्या शिखरों के उस पार है।

तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है,
भू पर धरोहर का अंबार है,
देखो क्या शिखरों के उस पार है।।
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शब्दों का हठ

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शब्दों ने क्यूँ आज न जाने
भुरभुरा सा एक रूप धरा है,
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है,
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है,
आज अनुपम कुछ करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है।

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है स्वप्न से बनना,
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं।
कहते हैं मुझसे कि एक
थिरकती लौ की आस सा बनना,
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं।

कविताओं के छंद बना जब
पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा,
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र से मैंने फैलाना चाहा,
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर।

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है,
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा नई गढ़ना है,
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है,
शायद, उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है।।

 

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अरण्य का फूल

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बेलों लताओं और डालियों
पर सजते हैं कितने,
रूप रंग सुरभि से शोभित
कोमल हैं ये उतने।

असंख्य खिलते हैं यहाँ
और असंख्य मुरझाते हैं,
अज्ञात और अविदित कितने
धूल में मिल जाते हैं।

दो दिन की ख्याति है कुछ की
दो दिन पूजे जाते,
फिर कोई न पूछे उन्हें
जो वक्ष पर मुरझा जाते।

जग रमता उसी को है
जो फल का रूप है धरता,
अरण्य का वो फूल मूल
जो पेट किसी का भरता।।

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काव्य नहीं बंधते

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शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं,
स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते।
हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं,
किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते।
मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ,
पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते।
उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

अंतः में अटखेलियाँ तो भाव करते हैं,
किन्तु बन अभिव्यक्ति वो मुझसे नहीं रिसते।
ले निरंतर रूप वो मुझसे नहीं बहते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

न कोई ज़ंजीर न बाधा की बंदी मैं,
मनस से क्यों उदित हो तब काव्य नहीं बंधते।
साहित्य के नव संस्करण का पथ नहीं गढ़ते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

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शब्दों का हठ

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शब्दों ने आज न जाने क्यूँ
भुरभुरा सा एक रूप धरा है।
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है ।
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है ।
आज कुछ अलग करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है ॥

कविताओं की छंद बना जब
पतंग से मैंने उड़ाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर ।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र सा  मैंने फैलाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर ॥

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है आस से बनना ।
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं ।
कहते हैं मुझसे कि एक
फकीर की है दुआ सा बनना ।
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं ॥

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है ।
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा एक नई गढ़ना है ।
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है ।
शायद उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है ॥

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कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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पत्तों की बरसात

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आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ।
अंगड़ाई लेती थी सुबह
औंधी गहरी रात हुई थी ॥

पक्षी भी सारे अब चुप थे,
घोंसलों में बैठे गुमसुम थे,
कैसी ये घटना उनके संग
यूँही अकस्मात् हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

सूरज की अब धूप भी नम थी,
तपिश भी उसमें थोड़ी कम थी,
स्थिति बनाती और गहन तब
तेज़ हवा भी साथ हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

शर्म छोड़ सब पेड़ थे नंगे,
टेढ़े मेढ़े और बेढंगे,
झड़प हुई थी उनमें या कि
पत्तों की बरसात हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

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पतझड़

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कल्पना करो, कुछ दिनों में
ये बंजर हो जायेंगे।
ये हवा के संग लहलहाते पत्ते,
अतीत में खो जायेंगे॥

जब बारिश की बूंदों में
ये पत्ते विलीन होंगे।
क्या अश्रु में लिप्त
तब ये कुलीन होंगे?

विरह की ज्वाला में क्या
ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे?
या नवजीवन की प्रतीक्षा में
यूँही अटल रहेंगे?

क्या हवा के थपेड़ों में
झुक कर, टूट मरेंगे?
या चिड़ियों के घोंसलों का
फिर ये आशियाँ बनेंगे?

शायद, यूँहीं,
सभ्यताओं का अंत होता है।
या शायद,आरम्भ ही
इस अंत के परांत होता है॥

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