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Tissue Paper और कलम

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poetry

कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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Plastic deformation

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Courtesy: My birthday gift from a few dear friends

Yesterday, while walking,
I wrote some words in ink.
Some were bitter, harsh
Some rosy, lovely, pink.

Some warm and touching,
I poured from my heart.
Some reckless, careless,
Roughly scribbled, apart.

Some truth laden emotions,
Carefully weaved together.
Some shallow, unsettling,
Bound with a tether.

I sprayed my raw ideas.
Brewed them to unwind.
I laid some soft musings
Of a wandering mind.

I also sketched in ink
the faces that I met.
Wrote their names beneath
In case, I forget.

Last night, then, I slept,
Kept my pen aside.
Sleep flushed my writings
Left smudges behind.

Impressions of the nib
Stayed deep and dark.
Memories were tattered
Left was just the mark.

Deformations imbued
deeper inside me.
Shaping the face in mirror
That my eyes will see.

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कविता की चोरी

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शब्दों को कर के लय-बद्ध,
लिखे मैंने वो चंद पद्य,
मन की इच्छा के भाव थे वो,
मेरे अंतर्मन का रिसाव थे वो,
वो मेरी कहानी कहते थे,
मेरे निकट सदा ही रहते थे,
वो प्रेम सुधा बरसाते थे,
मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥

भाव-विभोरित करता रूप,
हर पंक्ति थी करुणा स्वरुप,
थे बिम्ब वो मेरी दृष्टि के,
मुझे सर्वप्रिय वो सृष्टि में,
मेरे सृजन की अनुपम प्रतिमा थे,
वो मान की मेरे गरिमा थे,
वो मेरी गाथा गाते थे,
मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥

पर बक्से से एक अवगत वो,
रहे दूर सदा ही जगत से वो,
निंदा का डर, सहस भी कम,
जाने कैसा मुझको था भ्रम,
कभी किसी कर्ण न पड़े कभी,
रहे मौन सदा वो छंद सभी,
जो ह्रदय को मेरे लुभाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

एक रोज़ अजब एक बात हुई,
एक दुर्घटना मेरे साथ हुई,
वो बक्सा मुझसे छूटा कहीं,
ढूंढा बहुत पर मिला नहीं,
मेरे ह्रदय की करुणा रूठ गयी,
हर भाव की गरिमा टूट गयी,
वो पृथक बड़ा तड़पाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

उनको ढूंढी मैं चहुंओर,
थी गयी रात, अब हुआ भोर,
वो छंद मेरे फिर मिले नहीं,
जो सूखे फूल फिर खिले नहीं,
असहाय, छोड़ कर उनका लोभ,
मैं भूली उनके विरह का क्षोभ,
अब भूत मेरा दर्शाते थे,
मेरे दिल को जो कभी भाते थे ॥

कई वर्ष घटना को बीत गए,
जो प्रिय थे अब वो अतीत बने,
विरह उनका फिर स्वीकृत कर,
नए छंदों का बना नव संकलन,
हर शब्द पर उनके धुल जमी,
मैं मर्म भी उनका भूल गयी,
पर ह्रदय में पीड़ा जगाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

नए छंदों को नयी भाषा दी,
दुनिया पर विजय की आशा दी,
अनुभव से फिर विश्वास जगा,
बक्से में कभी न उन्हें रखा,
नए पंख लगा, उन्हें उड़ने दिया,
हर व्यक्ति से मैंने जुड़ने दिया,
वो खुद पर बड़ा इठलाते थे,
मेरे दिल को सब बड़ा भाते थे ॥

मैंने भी बंधन तोड़े सभी,
खुद को उन्मुक्त भी किया तभी,
फिर सभा की मैं भी गरिमा बनी,
श्रोताओं की मैं भी हुई धनी,
पर ग्लानि एक ही बनी रही,
मेरे प्रिय को दुनिया न जान सकी,
जो स्मृति में आते जाते थे,
मेरे दिल को अब भी वो भाते थे ॥

एक रोज़ अजब फिर बात हुई,
एक कवि से मेरी मुलाकात हुई,
पूरे मंच को जिसने जीत लिया,
पर मुझे बड़ा भयभीत किया,
कविता थी उसकी नयी नहीं,
मुझसे जो खोयी वो उसने कही,
जो मेरी गाथा गाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

उसने कविता का अंत किया,
श्रोतागण पर था मन्त्र पढ़ा,
पर कविता तो वो मेरी थी,
कभी मुझसे जो उसने चोरी की,
मैं उठी अवाक क्रोधित होकर,
उसकी चोरी पर क्षुब्ध होकर,
जो शब्द अब उसे दर्शाते थे,
जो उसकी कहानी गाते थे,
वो दिल से तो मेरे आते थे,
मेरे दिल को वही तो भाते थे ॥

फिर आया समीप वो कवि मेरे,
“अरी! वंदन करता हूँ मैं तुझे,
इस कविता की है रचयिता तू,
तेरी सोच को भी मैं नमन करूँ,
अनुपम हैं तेरे शब्द भाव,
हो गया मुझे भी इनसे लगाव,
जो प्रेम-सुधा बरसाते हैं,
मेरे दिल को ये बड़ा भाते हैं ॥”

“जिस सभा में इनका गान किया,
मेरे नाम का बेहद मान हुआ,
पर ग्लानि में मैं जीता था,
चूंकि मैं न इसका रचयिता था,
अब क्षमाप्रार्थी हूँ मैं तेरा,
जो कह दे तू वही दंड मेरा,
मैंने लिया जो तुझे लुभाते थे,
तेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥”

मैं रही देखती उसे अवाक,
है कैसा ये मनुष्य बेबाक,
पहले कविता मेरी ले ली,
अब क्षमा का है ये इक्षुक भी ?
मैं क्षमा दान अब कैसे करूँ ?
वर्षों के वियोग को कैसे भरूँ ?
झूठे अश्रु न लुभाते हैं,
इसने लिया जो मुझे भाते हैं ॥

फिर अन्तः ने झंक्झोरा मुझे,
मेरी निद्रा को था तोड़ा जैसे,
“तूने रखा था जिन्हें बंद,
किया इस कवि ने उनको स्वछन्द,
श्रोतागण से तू वंचित रखी,
कभी मोल न उनका समझ सकी,
जो भाव तेरे दर्शाते थे,
तेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥”

“तूने बक्से में जब बंद किया,
तूने उनके अर्थ को व्यर्थ किया,
वास्तव में तूने ही रचना की,
पर जीवन दायक है ये कवि,
जिन शब्दों को तराशा तूने,
गा कर उन्हें है निखारा इसने,
अब भाव वो सब के दर्शाते हैं,
दिल के सबको अब भाते हैं ॥”

“सिक्के को पलट तू देख परे,
चोरी से तो कला का मान बढे,
जो छंद बक्से में थे बंद कभी,
अब जानते उनको लोग सभी,
स्वामित्व से तो है परे कला,
जब उसे यथोचित यश है मिला,
तेरी कला के सब गुण गाते हैं
तेरे छंद हर दिल को भाते हैं ॥”

हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए

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है जंग यहाँ फिर आज छिड़ी
है रण भूमि फिर आज सजी
अर्जुन ने अपना धनुष कसा
तरकश को फिर बाणों से भरा
इस बार भी भाई समक्ष खड़े
अर्जुन के बाण प्रत्यक्ष अड़े
अस्थिर मन फिर से सवाल करे
“अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?”

अर्जुन का पराक्रम है प्रबल
बाणों का शौर्य हुआ न कम
‘पर भाई से कैसे करें ये रण?’
व्यग्र-अशांत है अब भी मन
‘मन को वश में अब कैसे करें?
कर्म पर ही चित कैसे धरें?’
नैतिकता विचार विमूढ़ किये
अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?

व्याकुल अर्जुन, आह्वान किये
हर चर-अचर से एक मांग किये
“अरे ढूंढो कृष्ण को वन-वन में,
ज़रा पूछो जा के जन-जन से
जाने कटुता किस रूप फले
है छिड़ा द्वंद्व कैसे सुलझे?
अब धर्म को स्थायी कौन करे?
अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?”

सहसा, छटा बादलों का सेज
फूटी वाणी, सौम्य पर तेज़
“अरे ओ! जो भू पर विचरता है
किस कृष्ण कि बातें करता है?
किसे पाने को तू लालायित?
तुझे देख हुए सभी जीव चकित
क्यों बार बार ये कहता फिरे
कि हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?

वो कृष्ण जो पालनकर्त्ता है,
वो कृष्ण जो दुखों को हरता है,
जिसने धरती का सृजन किया,
जिसमें ही सबका अंत हुआ,
वो चहुँओर है व्याप्त तेरे
वो कृष्ण तो जन-जन में है बसे
फिर क्यों हर दिशा तू उसे ढूंढे
कि हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?”

“अरे! पुनः वही बेला आयी
कुरुक्षेत्र में हैं खड़े भाई
परिजन को लक्ष्य धरूँ कैसे
गुरु पर मैं प्रहार करूँ कैसे
महाभारत भी, अर्जुन भी वही
पर आया हरि का सन्देश नहीं
बिन सारथि रथ ये चले कैसे
अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?”

“तेरे असि से है क्षतिग्रस्त धरा
तू अब भी कृष्ण को ढूंढ रहा?
तेरे क्रोध से है अब तक क्या हुआ?
धरती का अंग ही सदा कटा
रण की न तूने क्या समझी व्यथा
क्या करेगी मृत पांडवों का पृथा
द्वापर का अंत क्यों भूल रहे?
क्यों हाय! कृष्ण को ढूंढ रहे?

वो है हर अणु में आच्छादित
तू क्यों करता उसको खंडित?
विश्वास न हो तो साध तू बाण
तू लेगा अपने ही कृष्ण के प्राण
जो जीत गया इस रण को भी
न तर पायेगा ग्लानि कभी
फिर कहता फिरेगा लोकों में
अरे हाय! कृष्ण तो चले गए।

है कलियुग ये, द्वापर ये नहीं
एक शर अब कृष्ण-अवतार नहीं
नेतृत्व तू ले और निर्णय कर
क्या रण हो किसी मतभेद का हल?
तू कर विरोध इस जंग का आज
अरे! छोड़ दे अब ये लोभ, ये ताज
जिसे ढूँढता है, उसे पा खुद में
अरे हाय! कृष्ण हर मन में बसे।

लिख दे स्वयं तू गीता इस बार
परिभाषित कर जीवन का सार
स्वाधिपत्य का तू अनुयायी बन
कि देख तुझे सीखे जन-जन
नैतिकता का अनुसरण तू कर
अब स्वयं तू रथ की डोर पकड़
जीवन अपना तू स्वयं रच दे
अरे हाय! कृष्ण कण-कण में मिले।”

यहाँ सब चलता है

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यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

श्वेत जामा ओढ़े है विनाश,
भू बिछी है निर्दोषों की लाश,
अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास,
ढेर हुआ बेबस विश्वास,
न्याय बना मूरत है
कबसे मना रहा अवकाश,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

सूख रहा निर्झर का पानी
मलिन है हाय! निरीह जवानी
तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के
रिसता है बस लहू करों से
हर क्षण हर पल बिखर रही है
व्याकुल उर की हर आस,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश
पुरखों का खंडित अवशेष
उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख की
कटु ध्वनि बजती है शंख की
मोल भाव में पतित हुआ है
गौरवान्वित इतिहास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

चिर होता यहाँ चीर-हरण अब
धर्म भी सोता करवट ले तब
गांधारी बन पट्टी बाँध कर
अज्ञानी का स्वांग रचाकर
लुटने देते घर को अपने
कह कर हरि का रास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

वायु-संग बहता विध्वंश
क्षोभित है हर अंश-अंश
निष्ठा का होता लुप्त वंश
विष फैलाता छल-कपट-दंश
निसहाय बड़गद, नोच उसे
सब क्षीण करते हैं विकास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

चाहे जो हो, जैसा भी ढंग हो
श्वेत श्याम या जो भी रंग हो
हर कुछ है वहाँ स्वीकृत जन को
आत्म-केन्द्रित जहाँ हर जीवन हो
होता है ऐसे स्थानों पर
केवल दासों का वास,
क्यूंकि सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

आलिंगन

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अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द
स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध ।

तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन
भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न ।

पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम
साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम ।

उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय
डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय ।

हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार
होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार ।

स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार
प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार ।

बीत गए वो क्षण पर हैं आज भी अंकित
पहले प्रेम का प्रवाह, ह्रदय में आज भी संचित ।

पूर्ण करने को मिलन वो इच्छित है ये मन
सम्पूर्ण हो प्रसंग जब हो पुनः आलिंगन ।।

ज्वलित बन तू

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(photo courtesy Himadri Mayank)

सूक्ष्म सी चिंगारी बन तू
टिमटिमा जुगनू के संग संग ।
ज्वाला का सामर्थ्य रख तू
अपने भीतर, अपने कण-कण ॥

नम्रता की लौ भी बन तू
जलती-बुझती, कम्पित अंग-अंग ।
सौम्य ज्योत हर ओर भर तू
रात्रि की कालिख में रोशन ॥

प्रेरणा की अग्नि बन तू
ज्वलित कर धरती का प्रांगन ।
आज अब कुछ ऐसे जल तू
प्रबुद्ध हो हर मन का आँगन ॥

उठ जाग ! ऐ भारतीय !

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Photo Courtesy Pratik Agarwal

उत्तेजना संदेह से कुंठित हैं मनोभाव
मिलती नही इस धूप से अब कहीं भी छाँव ।
हर अंग पर चिन्हित हुआ है भ्रष्ट का सवाल
आता नहीं है मन में कोई अब दूसरा ख्याल ॥

नीतियों में है कहीं फंसा वो राष्ट्रवाद
विकास को रोके हुए, हर ओर का विवाद ।
ओढ़े हुए हैं मैली कुचली संस्कृति फटी
आत्मदाह में जल रही किसानों की ये मिट्टी ॥

धर्म की निरपेक्षता के नारे लगाते हम
घर में ही अपने जाति पर लाशें बिछाते हम ।
उलझे हुए हैं चमडों के रंगों में वर्षों से
कहने को तो सब हैं एक पर भिन्न अरसों से ॥

सहन का हम पहने चोंगा, कहते हैं “चलता है!
अपने इस देश में तो ऐसा ही होता है ।”
जी रहे हैं हम कब से, दूजों पे मढ़ के दोष
आज खुद अनजान बन, खुद को रहे हैं नोंच ॥

कब तक जियेंगे दोगले विचारों के कुँए में?
कब तक रहेंगे इतिहास के साये के तले में?
कब तक चलेंगे हाथ हम उस बीते कल की थाम?
कि बन चुकी है लाश वो, ढल चुकी वो शाम ॥

कि बुझ गयी है लौ अब नानक की आँखों की
कि गिर गए सब पात अब बोधि की शाखों की ।
इतिहास का वो गौरव अब मद्धम सा है पड़ा
पर अस्थियों की ढेर पर भारत यहीं खड़ा ॥

उठ जाग कि भारत खड़ा संकीर्णता अधीन
कब से पड़ा तू आँख मीचें, वो अब नहीं स्वाधीन ।
कुछ करो कि ये डोर अब तुम्हारे हाथ है
इसकी हरेक लकीर अब तुम्हारे माथे है ॥

है वक्त कि सब समझें कि भारत न अब महान
है वक्त कि अब जानें कि वो जा चुके इंसान ॥
है वक्त कि अब जाग और पहचान अपना स्थान
है वक्त कि अब हमारा भविष्य पर हो ध्यान |

ले लो अब शपथ और ठान लो तुम आज
भारत है तुम्हारा, तुम ही रखोगे लाज ।
कर लो एक वचन ही बदलेंगे हम कुछ आज
बदलेंगे स्वयं को सभी, तभी बदलेगा समाज ॥

कि हम बनें चाणक्य, आर्यभट्ट बनें हम आज
कि हम ही चरक, बसु और भाभा भी हम ही आज ।
कि हम बनें सुभाष और शिवाजी हम ही बनें
कि हम ही लक्ष्मी बाई और गांधी भी हम बनें ॥

बदलेंगे हम सब आदतें बदलेंगे हम आधार
जो खो गयी इतिहास में लायेंगे हम वो धार ।
यूँ बदले हम अब स्वयं, कि अविवेकी भी प्रेरित हो
हमारे इस प्रयास से भारत सुसज्जित हो ।

बनाएंगे हम सार्थक तिरंगे के चक्र को
देखे उसे जो भारती, उसको भी फ़क्र हो ॥
जल उठे लहर क्रांति की हर दिल में दिया बन
कि उस दिए तले भारत फिर से बने रोशन ॥

चल पड़ा सन्यासी वो

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चल पड़ा सन्यासी वो, अपनी ही एक राह पर
तलवे को नग्न कर और भूत को स्याह कर |
बढ़ चला वो अपने पग से मार्ग को तराशता
आज बस उम्मीदें ही बन रही उसका रास्ता ||

जरुरत का सामान कुछ, काँधे पे अपने डाल कर
लक्ष्य की चाहत में है, स्वयं को संभाल कर |
चल रहे हैं कदम उसके कंकडों को चूमते
कीचड से लथपथ हैं पूरे, अपने धुन में झूमते ||

राहें अब उसकी बनी हैं, वो एक पथिक है बस
सराहती उद्यम है उसका धुंध भी बरस-बरस |
घास में नरमी है छाई मिट्टी गर्मी दे रही
वादियाँ भी उसके इस आहट से प्रेरित हो रही ||

अर्पित किया है आज खुद को सृष्टि के रंग रूप पर
प्रकृति भी संलग्न उसमे, सौम्य किरणे, धूप कर |
तृप्ति की ज्योत आज कण कण से उदीयमान है
बिखरी हुई हवा में अब उसकी हर एक मुस्कान है ||

अपने पद की छाप छोड़, बढ़ रहा अपनी डगर
पार हो हर अर्चनें, राह जो आये अगर |
उत्साह अपनी कमर बांधे और साहस बांह पर
चल पड़ा सन्यासी वो, आज अपनी राह पर ||

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