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Tissue Paper और कलम

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शब्दों का हठ

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शब्दों ने आज न जाने क्यूँ
भुरभुरा सा एक रूप धरा है।
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है ।
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है ।
आज कुछ अलग करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है ॥

कविताओं की छंद बना जब
पतंग से मैंने उड़ाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर ।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र सा  मैंने फैलाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर ॥

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है आस से बनना ।
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं ।
कहते हैं मुझसे कि एक
फकीर की है दुआ सा बनना ।
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं ॥

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है ।
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा एक नई गढ़ना है ।
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है ।
शायद उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है ॥

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कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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बढ़ चलें हैं कदम फिर से

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छोड़ कर वो घर पुराना,
ढूंढें न कोई ठिकाना,
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।

ऊंचाई कहाँ हैं जानते,
मंज़िल नहीं हैं मानते।
डर जो कभी रोके इन्हें
उत्साह का कर हैं थामते।

कौतुहल की डोर पर
जीवन के पथ को है बढ़ाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

काँधे पर बस्ता हैं डाले,
दिल में रिश्तों को है पाले।
थक चुके हैं, पक चुके हैं,
फिर भी पग-पग हैं संभाले।

खुशियों की है खोज
कि यात्रा तो बस अब है बहाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

जो पुरानी सभ्यता है
छोड़ कर पीछे उन्हें अब।
किस्से जो बरसों पुराने
बच गए हैं निशान से सब।

की नए किस्सों को पग-पग
पर है अपने जोड़ जाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

कोई कहे बंजारा तो
बेघर सा कोई मानता है।
अनभिज्ञ! अज्ञात से परिचय
का रस कहाँ जानता है।

जोड़ कर टूटे सिरों को,
विश्व अपना है रचाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

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चल, उचक, चंदा पकड़ लें

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ज़िन्दगी से पल चुरा कर
फिर हंसी की धुन को सुन लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

पक चली उस कल्पना को
रंग-यौवन-रूप फिर दें ।
संकुचित उस सोच के पंखों में
फिर से जान भर दें ।

तर्क के बंधन से उठ कर
बचपने का स्वाद चख लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

शंका की सीमा हटा,
अद्वितीय कोई काम कर दें ।
जिंदगी की होड़ से
हट कर कोई संग्राम कर दें ।

फिर से जिज्ञासा-पटल पर
साहसी ये पाँव रख दें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

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मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस
चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस

जब चाँद छुपा था बादल में,
था लिप्त गगन के आँगन में,
मैं रात की चादर को ओढ़े
तारों से बातें करती थी ।
मैं नभ के झिलमिल प्रांगण से
सपनों के मोती चुनती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब सूर्य किरण से रूठा था,
प्रकाश का बल भी टूटा था,
मैं सूर्य-किरण के क्षमता की
गाथायें गाया करती थी ।
धागों के बाती बना-बना
जग का अँधियारा हरती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब हरियाली मुरझाई थी,
शुष्कता उनपर छायी थी,
मैं भंगूरित उन मूलों को
पानी से सींचा करती थी ।
पेडों की सूखी छाँवों में
मैं पौधे रोपा करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब ईश्वर भक्त से रुष्ट हुआ,
कर्मोँ पर उसके क्रुद्ध हुआ,
निष्ठा की गीली मिट्टी से
विश्वास का पात्र मैं गढ़ती थी ।
मैं आस की कम्पित लौ से भी
श्रद्धा को प्रज्ज्वल करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

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कविता की चोरी

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शब्दों को कर के लय-बद्ध,
लिखे मैंने वो चंद पद्य,
मन की इच्छा के भाव थे वो,
मेरे अंतर्मन का रिसाव थे वो,
वो मेरी कहानी कहते थे,
मेरे निकट सदा ही रहते थे,
वो प्रेम सुधा बरसाते थे,
मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥

भाव-विभोरित करता रूप,
हर पंक्ति थी करुणा स्वरुप,
थे बिम्ब वो मेरी दृष्टि के,
मुझे सर्वप्रिय वो सृष्टि में,
मेरे सृजन की अनुपम प्रतिमा थे,
वो मान की मेरे गरिमा थे,
वो मेरी गाथा गाते थे,
मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥

पर बक्से से एक अवगत वो,
रहे दूर सदा ही जगत से वो,
निंदा का डर, सहस भी कम,
जाने कैसा मुझको था भ्रम,
कभी किसी कर्ण न पड़े कभी,
रहे मौन सदा वो छंद सभी,
जो ह्रदय को मेरे लुभाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

एक रोज़ अजब एक बात हुई,
एक दुर्घटना मेरे साथ हुई,
वो बक्सा मुझसे छूटा कहीं,
ढूंढा बहुत पर मिला नहीं,
मेरे ह्रदय की करुणा रूठ गयी,
हर भाव की गरिमा टूट गयी,
वो पृथक बड़ा तड़पाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

उनको ढूंढी मैं चहुंओर,
थी गयी रात, अब हुआ भोर,
वो छंद मेरे फिर मिले नहीं,
जो सूखे फूल फिर खिले नहीं,
असहाय, छोड़ कर उनका लोभ,
मैं भूली उनके विरह का क्षोभ,
अब भूत मेरा दर्शाते थे,
मेरे दिल को जो कभी भाते थे ॥

कई वर्ष घटना को बीत गए,
जो प्रिय थे अब वो अतीत बने,
विरह उनका फिर स्वीकृत कर,
नए छंदों का बना नव संकलन,
हर शब्द पर उनके धुल जमी,
मैं मर्म भी उनका भूल गयी,
पर ह्रदय में पीड़ा जगाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

नए छंदों को नयी भाषा दी,
दुनिया पर विजय की आशा दी,
अनुभव से फिर विश्वास जगा,
बक्से में कभी न उन्हें रखा,
नए पंख लगा, उन्हें उड़ने दिया,
हर व्यक्ति से मैंने जुड़ने दिया,
वो खुद पर बड़ा इठलाते थे,
मेरे दिल को सब बड़ा भाते थे ॥

मैंने भी बंधन तोड़े सभी,
खुद को उन्मुक्त भी किया तभी,
फिर सभा की मैं भी गरिमा बनी,
श्रोताओं की मैं भी हुई धनी,
पर ग्लानि एक ही बनी रही,
मेरे प्रिय को दुनिया न जान सकी,
जो स्मृति में आते जाते थे,
मेरे दिल को अब भी वो भाते थे ॥

एक रोज़ अजब फिर बात हुई,
एक कवि से मेरी मुलाकात हुई,
पूरे मंच को जिसने जीत लिया,
पर मुझे बड़ा भयभीत किया,
कविता थी उसकी नयी नहीं,
मुझसे जो खोयी वो उसने कही,
जो मेरी गाथा गाते थे,
मेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥

उसने कविता का अंत किया,
श्रोतागण पर था मन्त्र पढ़ा,
पर कविता तो वो मेरी थी,
कभी मुझसे जो उसने चोरी की,
मैं उठी अवाक क्रोधित होकर,
उसकी चोरी पर क्षुब्ध होकर,
जो शब्द अब उसे दर्शाते थे,
जो उसकी कहानी गाते थे,
वो दिल से तो मेरे आते थे,
मेरे दिल को वही तो भाते थे ॥

फिर आया समीप वो कवि मेरे,
“अरी! वंदन करता हूँ मैं तुझे,
इस कविता की है रचयिता तू,
तेरी सोच को भी मैं नमन करूँ,
अनुपम हैं तेरे शब्द भाव,
हो गया मुझे भी इनसे लगाव,
जो प्रेम-सुधा बरसाते हैं,
मेरे दिल को ये बड़ा भाते हैं ॥”

“जिस सभा में इनका गान किया,
मेरे नाम का बेहद मान हुआ,
पर ग्लानि में मैं जीता था,
चूंकि मैं न इसका रचयिता था,
अब क्षमाप्रार्थी हूँ मैं तेरा,
जो कह दे तू वही दंड मेरा,
मैंने लिया जो तुझे लुभाते थे,
तेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥”

मैं रही देखती उसे अवाक,
है कैसा ये मनुष्य बेबाक,
पहले कविता मेरी ले ली,
अब क्षमा का है ये इक्षुक भी ?
मैं क्षमा दान अब कैसे करूँ ?
वर्षों के वियोग को कैसे भरूँ ?
झूठे अश्रु न लुभाते हैं,
इसने लिया जो मुझे भाते हैं ॥

फिर अन्तः ने झंक्झोरा मुझे,
मेरी निद्रा को था तोड़ा जैसे,
“तूने रखा था जिन्हें बंद,
किया इस कवि ने उनको स्वछन्द,
श्रोतागण से तू वंचित रखी,
कभी मोल न उनका समझ सकी,
जो भाव तेरे दर्शाते थे,
तेरे दिल को जो बड़ा भाते थे ॥”

“तूने बक्से में जब बंद किया,
तूने उनके अर्थ को व्यर्थ किया,
वास्तव में तूने ही रचना की,
पर जीवन दायक है ये कवि,
जिन शब्दों को तराशा तूने,
गा कर उन्हें है निखारा इसने,
अब भाव वो सब के दर्शाते हैं,
दिल के सबको अब भाते हैं ॥”

“सिक्के को पलट तू देख परे,
चोरी से तो कला का मान बढे,
जो छंद बक्से में थे बंद कभी,
अब जानते उनको लोग सभी,
स्वामित्व से तो है परे कला,
जब उसे यथोचित यश है मिला,
तेरी कला के सब गुण गाते हैं
तेरे छंद हर दिल को भाते हैं ॥”

स्मारक का गौरव

PC: Pratik Agarwal
प्रम्बनन के जीर्ण  (छवि: प्रतीक अग्रवाल)

 

टूटे-फूटे एक स्मारक ने घंटों की मुझसे बात । 
पिछले वर्षों के भूकंपों ने तोड़े थे उसके हाथ ॥ 
 
आया था कभी सौ वर्ष पूर्व एक मध्य रात्रि तूफ़ान ।  
खोया था तब सर स्मारक ने, बच गए पर उसके प्राण ॥ 
 
टूटा-फूटा जर-जर था देह, पर बुलंद उसकी आवाज़ । 
भूली-बिसरी संस्कृति का अब बस यही बचा था ताज ॥ 
 
एकाकी रूप, पर सबल स्वरुप, वो कहता रहा कहानी । 
गौरव से पूर्ण, निष्ठा सम्पूर्ण, वो पिछले युग का था प्राणी ॥ 
 
राजा ने कभी वर्षों देकर, थी गढ़ी उसकी हर प्रतिमा । 
सोचा था कि वो सुनाएगा मीलों उस राज्य की महिमा ॥ 
 
वास्तु का अद्भुत रूप था वो, थी शिल्पकला भी अनुपम ।  
वो सबल कृति, दर्शाता था समृद्धि मेधा का संगम ॥ 
 
वर्षों तक उसका प्रताप रहा, पर अंत हुआ एक शाम । 
जब राजा अपनी सेना संग हारा एक प्रमुख संग्राम ॥ 
 
लूटा स्मारक को जन-जन ने, तोड़ा था उसका प्रांगण । 
लूटा था उसका रंग रूप, किया तहस-नहस वो उपवन ॥
था छिद्र-छिद्र वो स्मारक, पर कण-कण था छलकता तेज ।
ताने सीना वो डटा रहा, क्या हुआ जो लुट गयी सेज ॥ 
 
प्रकृति ने भी फिर रूप बदल, चले अनेक ही चाल । 
हो गया था सारा अंग भंग, पर महिमा रही विशाल ॥ 
 
वो प्रौढ़ रूप, वैभव का दूत, बना संस्कृति की पहचान । 
अब गौण राज्य, बदला समाज, पर डटा रहा वो महान॥ 
 
स्मारक ने फिर कहा मुझसे कि मर जाते हैं प्राणी । 
पर हम जैसे सृजन उनके दोहराएं उनकी कहानी ॥ 
 
महिमा गाने को हुआ जन्म, है जीवन का यही अर्थ । 
जो कृति अहम में डूब गयी, हुआ उसका जीवन व्यर्थ ॥ 
 
गौरव के पथ पर चला नहीं, न कृत्य हुआ वो कृतार्थ । 
जो जन्म मरण से अबाध्य खड़ा, है बना वही परमार्थ ॥ 

उजाले से आलिंगन

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अशांत व्यग्र अतृप्त है मन
भावों में कुंठित, लिप्त है मन ।
तम प्रबल आंधी सा बनकर
छीनता मन से है यौवन॥

किन्तु है एक चन्द्र ज्योति
नभ के माथे पर सुशोभित ।
उजाला बन वो तम से लड़ती
करती है कण-कण प्रकाशित ॥

दीप के लौ सी है उज्जवल
सूर्य किरणों में है पलती ।
जल क्षितिज वायु में बस कर
मन के तम को झट ही हरती ॥

मन कभी फिर प्रेरणा ले
सोचता कि उठ खड़ा हो ।
इन्द्रियों से अपनी कहता
“आज इस तम को हरा दो ॥

चन्द्रमा की श्वेत ज्योति
कर में आपने आज धर लो ।
पथ का है जो उजाला बनती
आलिंगन उसका आज कर लो”॥

परिवर्तन

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मुझपे बहती जब द्रव की धार,
बढ़ती मुझमें ऊर्जा अपार ।
सूक्ष्म है मेरा रूप तो क्या,
करती मैं भी सीमाएं पार ॥

जंग छिड़ती, योद्धा मरते,
बदलाव आते कुछ इस प्रकार ।
शोभित होकर मैं दल-बल से,
लड़ती प्रभाव से अपरम्पार ॥

नाभिका (nucleus) तब बन कर सूत्रधार,
बदले है मेरे भाग्य-विचार ।
नियति आकस्मिक लेती मोड़,
खुलते नव-जीवन तरुण द्वार ॥

जीवन धारा नव पथ गढ़ती,
रचती मैं अपना नव-संसार ।
चहुँ ओर गूंजती लहर यही,
‘परिवर्तन ही जीवन आधार’ ॥

(यह कविता Differentiation नाम के एक जैविक घटना (biological phenomenon) पर आधारित है । जब किसी तरल/द्रव वस्तु (fluid) की धार stem cell पर बहती है, तब उसका बल बढ़ जाता है और वो differentiate होकर एक नयी कोशिका रूप (cell type) बन जाती है । )

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