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Tissue Paper और कलम

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hindi poems

कल्पना की दुनिया

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यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

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चल, उचक, चंदा पकड़ लें

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ज़िन्दगी से पल चुरा कर
फिर हंसी की धुन को सुन लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

पक चली उस कल्पना को
रंग-यौवन-रूप फिर दें ।
संकुचित उस सोच के पंखों में
फिर से जान भर दें ।

तर्क के बंधन से उठ कर
बचपने का स्वाद चख लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

शंका की सीमा हटा,
अद्वितीय कोई काम कर दें ।
जिंदगी की होड़ से
हट कर कोई संग्राम कर दें ।

फिर से जिज्ञासा-पटल पर
साहसी ये पाँव रख दें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

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मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस
चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस

जब चाँद छुपा था बादल में,
था लिप्त गगन के आँगन में,
मैं रात की चादर को ओढ़े
तारों से बातें करती थी ।
मैं नभ के झिलमिल प्रांगण से
सपनों के मोती चुनती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब सूर्य किरण से रूठा था,
प्रकाश का बल भी टूटा था,
मैं सूर्य-किरण के क्षमता की
गाथायें गाया करती थी ।
धागों के बाती बना-बना
जग का अँधियारा हरती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब हरियाली मुरझाई थी,
शुष्कता उनपर छायी थी,
मैं भंगूरित उन मूलों को
पानी से सींचा करती थी ।
पेडों की सूखी छाँवों में
मैं पौधे रोपा करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब ईश्वर भक्त से रुष्ट हुआ,
कर्मोँ पर उसके क्रुद्ध हुआ,
निष्ठा की गीली मिट्टी से
विश्वास का पात्र मैं गढ़ती थी ।
मैं आस की कम्पित लौ से भी
श्रद्धा को प्रज्ज्वल करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

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ये लहरें किधर हैं जाती?

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डूब रहा है सूरज
और गोधूलि हुई है बेला,
बादल के सिरहाने पर
किरणों का लगा है मेला ।

ऐसे में ये चंचल लहरें
छोड़ के अपने घर को,
बेसुध हो, बेसब्र वो सारी,
जाने चली किधर को !

नील से गहराता है गगन
और चन्द्र का चढ़ता यौवन,
श्वेत रश्मि से प्रज्ज्वल है
तारों से सज्ज ये उपवन।

शीतलता की छाँव में भी
वो बांधे हुए हैं कर को,
बेसुध हो, बेसब्र वो सारी,
जाने चली किधर को !

समा के सारे नील गगन को
अपने उर के अंदर,
क्षितिज से भेंट हुई तो समझें
खुद को सभी सिकंदर !

वक्त नहीं कि रुके किनारे
साराह सकें वो नभ को,
बेसुध हो, बेसब्र वो सारी,
जाने चली किधर को !

बहती जातीं अपने वेग में
डगर हो चाहे जैसी,
रूप की सुध से वंचित रहती
दौड़ ये इनकी कैसी !

जाने क्या पाने को आतुर
तोड़ती अपना जड़ वो,
बेसुध हो, बेसब्र वो सारी,
जाने चली किधर को !

रुकें ज़रा तो मैं भी पूछूं
कैसा ये जीवन है!
छोड़ के अद्भुत दुनिया सारी
राह चुनी क्यूँ विषम है ?

अंत कहाँ इस दौड़ का, बोलो,
व्याकुल तुम हो जिधर हो,
बेसुध हो, बेसब्र ओ सारी !
जाने चली किधर को !

प्यास कौन से खींचे तुमको?
भागती किसके पीछे?
चल दी एक दूजे के पीछे
क्यूँ भला आँखें मींचे?

निगल रही सबको जलधि है
जैसे कोई भंवर हो,
बेसुध हो, बेसब्र ओ सारी !
जाने चले किधर को !

वर्तमान अज्ञात बना,
है किस भविष्य की आस?
क्षण भर का अस्तित्व यहाँ है
क्षण भर का है वास।

क्षण-क्षण जो हर श्वास को चखे
प्रगति उसकी प्रखर हो,
बेसुध हो, बेसब्र ओ सारी !
जाने चली किधर को !

बेटी घर आयी है

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देखो आया अवसर पावन,
स्नेह-विभोर घर का जन-जन,
हर्षित उमंग जागा हर मन,
आशीष छलकता है कण-कण,

नवज्योत घर पर छाई है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

ओढ़े सम्मान का दुशाला,
सौम्य, विनीत, स्फटिक प्याला,
मधु-प्रेम ने है उसको ढाला,
वो धीर, विवेकी, दक्ष बाला,

संस्कृति पग-पग लायी है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

जगदम्ब-सूर्य के कानन में,
विजया-भुवन के आँगन में,
सकल माधुर्य भर कर मन में,
इस मृदु-प्रकाश के प्रांगण में,

हर्षित श्रुति दी सुनायी है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

यह कविता मेरी प्रिय भाभी के घर आगमन पर उनको समर्पित की गयी है।

करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन

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पृष्ठभूमि : अभिमन्यु चक्रव्यूह के आखिरी चरण में हैं। वे खुद को ये समझा रहे हैं कि अंतिम चरण की लड़ाई कैसे उनके कौशल पर निर्भर करती है । खुद को समझाने की इस क्रिया में वे चक्रव्यूह में प्रवेश करने के निर्णय से लेकर अंतिम चरण तक पहुँचने की कहानी को स्मरण करते हैं ।

कर चुका कई वीरों का दमन
और प्रविष्ट हुआ मैं अंतिम चरण
अब करूँ मैं वो आरम्भ स्मरण
लिया निर्णय मैंने जिस क्षण
‘अब आये राह में कोई अड़चन
करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन’ ।

‘कुरुक्षेत्र में था चक्रव्यूह सजा
कौरवों ने क्या षड़यंत्र रचा
अर्जुन थे लड़ने दूर गए
सब कुंती-पुत्र थे विमूढ़ खड़े’
कैसे न करता मैं स्व अर्पण?
‘करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन’ ।

‘माँ के गर्भ को याद किया
जब पिता से व्यूह का ज्ञान लिया
सीखा मैंने भीतर जाना
न सीख सका बाहर आना
था अपूर्ण ज्ञान, पर पूर्ण स्मरण
करना मुझे ही था व्यूह-खंडन’ ।

‘माँ की ममता न रोकी मुझे
मोह न था कोई जकड़े मुझे’
पुरखों को दिलाऊँ न्याय सही
जन्म ये मेरा सफल हो तभी
कर्त्तव्य ही है ये मेरा जीवन
करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन ।

‘करने पिता का पूर्ण मैं काज
रखने को अपने कुल की लाज
साहस को अपनी बाँह बाँध
घुस गया था मैं शेरों की मांद
व्यग्र होता मेरा कण-कण
करना मुझे ही था व्यूह-खंडन ।

सीखी पिता से थी युद्ध कला
अंतस्थ उसे कर मैं निकला
तीरो का कुछ यूँ दौर चला
जड़ रुपी पद्म का द्वार कटा
कांपी धरती कांपा वो गगन
कर रहा था मैं यूँ व्यूह-खंडन ।

हर योद्धा पहले पर भारी था
पर युद्ध तो मेरा जारी था
हर शूरवीर को परास्त किया
दुर्योधन-पुत्र का अस्त हुआ
लड़ा मैं ऐसा संग्राम गहन
करना मुझे ही था व्यूह-खंडन ।’

मैं आया सर्पिल-चक्र अंदर
था ज्ञात यहीं तक का उत्तर
महारथी कई हैं समक्ष खड़े
है बाण-भाल सब ले के अड़े
एकाग्र करूँ खुद को हर क्षण
करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन ।

आ चूका है देखो अंतिम चरण
कि लक्ष्य पर ही हों टिके नयन
पूरी ऊर्जा से अब मैं लड़ूँ
किसी छल कपट से अब मैं न डरूँ
जीतूँ जिस ओर भी रखूँ चरण
करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन ।

रोके पराक्रमी समूह तो क्या
सीखा न तोडना व्यूह तो क्या
अपूर्ण विद्या न बेड़ी बने
कौशल को थाम मेरी शक्ति बढ़े
न डर मुझमें, न कोई स्पंदन
करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन ।

कम आयु न मेरा अवरोध करे
मेरे जनन का सृष्टि बोध करे
मैं लिख दूं अब एक ऐसा कल
मेरा स्मरण करे ये विश्व सकल
हर वीर करे सदा मुझे नमन
मैं अवश्य करूंगा व्यूह-खंडन ।

आलिंगन

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अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द
स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध ।

तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन
भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न ।

पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम
साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम ।

उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय
डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय ।

हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार
होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार ।

स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार
प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार ।

बीत गए वो क्षण पर हैं आज भी अंकित
पहले प्रेम का प्रवाह, ह्रदय में आज भी संचित ।

पूर्ण करने को मिलन वो इच्छित है ये मन
सम्पूर्ण हो प्रसंग जब हो पुनः आलिंगन ।।

ऊंची नाक वाले अंकल

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कल शाम मिले मुझे एक अंकल
बहुत ही ऊंची नाक थी उनकी ।
कपडे थोड़े फटे हुए थे
तनी हुई पर शाख थी उनकी ॥

जब जहां जब भी वो जाते
पहले उनकी नाक पहुँचती ।
सबसे जग में यही बताते
सबसे ऊंची नाक है उनकी ॥

कभी जो दिल उनका कुछ चाहे
पहले वो अपनी नाक से मापें ।
नाक की कद से जो ऊंचा हो
उसे ही अपने योग्य वो समझे ॥

देखते वो पहचान में आये
किया ‘नमस्ते’ सर को झुकाए ।
असमंजस में लगे ज़रा वो
ध्यान कहीं और कहीं को जायें ॥

टकटकी लगाये देखते थे वो
वहाँ झूलते हुए झूलों को ।
तोड़ रहे थे साथ-साथ वो
पूजा के लिए फूलों को ॥

मैंने बोला, ‘ अंकल जी!
कभी तो कर लो दिल की भी ।
कभी तो सारे बंधन तज दो
छोड़ दो नाक की चिंता भी ॥’

अंकल बोले, ‘शान यही है
आन यही है, मान यही है ।
नाक नहीं तो समझ लो बच्चे
उस मनुष्य के प्राण नहीं हैं ॥’

‘प्राण नाक में धरे हुए हैं ?
बात ये ज़रा उलझी सी है?
मुझे तो लगता था, अंकल जी!
नाक बस साँसों की नली है । ‘

‘बहुत छोटे हो बच्चे तुम
समझ ना आयेगी तुम्हे ये बात ।
जो पालन करे नियम समाज के
सबसे ऊंची है उसकी नाक ॥’

‘अच्छा अंकल! एक बात बताओ
किसने बनाये ये नियम समाज के ।
क्या कुछ भी गलत नहीं है
हम जो निभाएं उस रिवाज़ में? ‘

‘तुम बहुत उद्दंड हो बच्चे
रिवाजों पर सवाल करते हो!
जाओ खेलो बागों में जाकर
क्यूँ फ़ालतू बातें करते हो?

रिवाज़ गलत होते हैं कुछ
पर उन्हें मानना ज़रूरी है ।
इज्ज़त उसी की बनी रहती है
जो उन्हें करता पूरी है ॥’

‘गलत को भी आँख मूँद कर
कैसे अब मैं सही मान लूं?
कैसे खोखले नियम मान कर
नाक ऊंची रखने पे ध्यान दूं?

नाक तो ऊंची उसी की होनी
पहले परखे जो हर प्रथा को ।
ना माने हर उस प्रचलन को
सुनी हो किसी कथा में जो ॥

नाक तो ऊंची उसी की होनी
जो सत्य का जाने मोल ।
और ये झूठे नियम तोड़ कर
बनाये ये सृष्टि अनमोल ॥’

ये बातें सुन झेंप गए वो
ज़रा सी झुक गयी उनकी नाक ।
लज्जित हो वो वहाँ से भागे
छोड़ी वहीँ फूलों की डाल ॥

समाज के कई बुरे नियम हैं
पाली जो सबने आँखें मींच के ।
बिना सोचे समझे जाने क्यूँ
अब तक रहे वो उन्हें सींचते ॥

पर ये सब ना करूँगा मैं
बनाऊंगा एक ऐसा समाज ।
जहां सब हों एक सामान
निष्ठुर हो ना कोई भी रिवाज़ ॥

प्रथाएं ऐसी जो जोडें मनुष्य को
पीढ़ियों में ना बंटे समाज ।
धर्म से ज्यादा कर्म को समझें
ऊंची हो जहां सबकी नाक॥’

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