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हृदय को अकुलाता ये विचार है,
दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है,
बसता क्या शिखरों के उस पार है।

उठती अब तल से चीख पुकार है,
करती जो अंतः में चिंघाड़ है,
छुपा क्या शिखरों के उस पार है।

हृदय को नहीं ये स्वीकार है,
क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है ,
जाने क्या शिखरों के उस पार है।

तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है,
भू पर धरोहर का अंबार है,
देखो क्या शिखरों के उस पार है।।
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