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यूँ तो हर मौसम की अपनी मनमानी होती है,
पर ठण्ड की एक दिलचस्प ही कहानी होती है।
धुंध से भीगी रातें तो रूमानी होतीं हैं,

पर दिसंबर में सर्दी दंतकड़कड़ानी होती है॥

ठण्ड अपनी चादर हर ओर कुछ ऐसे फैलाता है,
नाड़ी का खून enzyme नहीं, तापमान जमाता है।
गर्मी की deficiency में रोज़ कौन नाहता है,

यह जान कर deodorant मन ही मन इतराता है ॥

सर्दी अपने प्रस्ताव से हमारी हैरानी उकसाती है ,
इस मौसम में आँसू हमारी नाक बहाती हैं,
ठण्ड से कांपते कदमों को आग की गर्मी जमाती है

रजाई refugee camp सी नज़र आती है ॥

मन पर अद्भुत सा एक प्रभाव पड़ता है,
घर की दहलीज़ लांघने में ये घंटों तक डरता है,
सहम कर ये muffler का बंटवारा करता है,

Pant के खली कोने भी thermals से भरता है ॥

तभी उँगलियों व् नाक पर ठण्ड की मार क्रूर पड़ती है,
कपडे चार न चढ़ाओ तो संतुष्टि भी आने से डरती है।
बेरुखी से हवा जब गालों पर दो तमाचे जड़ती है,

गालों की लालिमा exponential rate से बढती है ॥

heater की आग से चिढ कभी fire alarm बज जाता है,
और तब मन एक गहन उलझन में पड़ा जाता है,
Jacket और आग में priority तय न कर पाता है

इसी उधेड़बुन में कीमती वक़्त निकल जाता है ॥

इन्ही कुछ असमंजसो से भीगी पेशानी होती है,
अपनी helplessness पर हमको आप ही हैरानी होती है।
दोहराई जाने वाली ये कहानी पुरानी होती है,

ठण्ड की भी अजीब ये कहानी होती है ॥

 

(यह प्रसन्नचित कवीता अनुराग कनौजिआ के सहयोग में लिखी गयी है)

 

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