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बेलों लताओं और डालियों
पर सजते हैं कितने,
रूप रंग सुरभि से शोभित
कोमल हैं ये उतने।

असंख्य खिलते हैं यहाँ
और असंख्य मुरझाते हैं,
अज्ञात और अविदित कितने
धूल में मिल जाते हैं।

दो दिन की ख्याति है कुछ की
दो दिन पूजे जाते,
फिर कोई न पूछे उन्हें
जो वक्ष पर मुरझा जाते।

जग रमता उसी को है
जो फल का रूप है धरता,
अरण्य का वो फूल मूल
जो पेट किसी का भरता।।

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