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ज़िन्दगी से पल चुरा कर
फिर हंसी की धुन को सुन लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

पक चली उस कल्पना को
रंग-यौवन-रूप फिर दें ।
संकुचित उस सोच के पंखों में
फिर से जान भर दें ।

तर्क के बंधन से उठ कर
बचपने का स्वाद चख लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

शंका की सीमा हटा,
अद्वितीय कोई काम कर दें ।
जिंदगी की होड़ से
हट कर कोई संग्राम कर दें ।

फिर से जिज्ञासा-पटल पर
साहसी ये पाँव रख दें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

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