चित्र : विकिपीडिया

भू के कुछ वर्गों के पीछे
हम लड़े सदियों यहाँ ।
मच गया विध्वंस पर
किसको भला है क्या मिला ॥

संघर्ष के इतिहास में
धूमिल है गाथा प्रान्त की ।
पथ-प्रदर्शक थे जो सारे
करते हैं अब भ्रांत ही ॥

युद्ध जो वर्षों लड़े
क्या हल था उसका प्रीत से?
अब लड़ें अस्तित्व से
हम जूझते हैं अतीत से ॥

खो गयी पहचान सब
वो रूप यौवन रंग भी ।
‘सत्य क्या?’ न प्रश्न ये
जो अब हैं हम, वो हम नहीं ॥

सुलझा देता कोई आ
जो काल की इन जटाओं को ।
फिर से लगते फूल-पत्ते
रक्त संचित लताओं को ॥

फिर से हो जीवंत मैं
हिम के शिखर को चूमती ।
कुचले-मसले हैं जो धागे
उनको दिल से गूंथती ॥

पर ये अब भी स्वप्न कि
लाशें हैं अब भी बिछ रहीं ।
और सब रक्षक हैं बैठे
आँखों को मींचे कहीं ॥

क्या करूँ, मैं रोकूँ कैसे
रक्तमय इस विवाद को?
सुन ले कोई मेरी भी कि
अब युद्ध का प्रतिवाद हो ॥

अंत कर दो युद्ध का
कि हल करो मसला अभी ।
कल को अपने तह लगा
पहचान ढूँढू मैं नयी ॥

(भारत और पाकिस्तान में ६७ वर्षों से ये विवाद चलता आया है कि कश्मीर किस देश का हिस्सा है । और साथ ही साथ, कुछ लोग कश्मीर को एक स्वतंत्र देश बनाने का समर्थन भी करते आये हैं । तीनों बलों के इस विवाद में कई लोगों ने अपने जीवन का दान किया है किन्तु, आज तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकला । सभी अपने-अपने स्थान पर अडिग रहे हैं। कश्मीर के अस्तित्व का ये भ्रम ही इस कविता का आधार है ।)

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