20140410_205345 (2)
मैं मीन तरूँ निर्झर-निर्झर,
निर्झर संग गई मैं इधर-उधर ।
पर्वत ऊंचे-ऊंचे देखे,
देखे मैंने पाँचों सागर ॥

कभी पात-पात, कभी जल-प्रपात,
तैरी मैं तो हर प्रहर आठ ।
निर्झर प्रवाह की संगिनी मैं,
मैंने देखे उसके सब घाट ॥

सीखे निर्झर से पाठ कई,
वो तरल हुआ मैं नम्य बनी ।
समर्पण कण-कण में भर कर,
भावों में उसके सौम्य हुई ॥

हूँ पूर्ण मैं निर्झर से मिलकर,
जीवंत मैं उसके लहर-लहर ।
दृढ-संकल्पी उस-सा बनूँ,
मैं मीन तरूँ निर्झर-निर्झर ॥

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