HoliHands (2)

रंग-रंग मस्तक पे चढ़ा हो
रंग-रंग हर अंग लगा हो ।
रंग ऐसा जो कभी न उतरे,
ऐसे रंग का भंग पिया हो ॥

रंग ऐसे हम चुनें जो मिलके,
एक ही रंग से मुख को रंग दे ।
बाह्य-रूप इतना धुंधला हो,
रंग-रंग अंतस का उभरे ॥

अंतर न कर सके जो कोई,
भ्रमित सर्जक भी देख हुआ हो ।
रंग ऐसा जो कभी न उतरे,
ऐसे रंग का भंग पिया हो ॥

चित्त डूबा हो प्रेम-रंग में,
सब बन जाएं दर्पण सबके ।
भूलें अपने कल को सारे,
पवित्राग्नि में अर्पण करके ॥

समरंगी संवाद करें और,
सम से ही ये समूह बना हो ।
रंग ऐसा जो कभी न उतरे,
ऐसे रंग का भंग पिया हो ॥

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