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देखो आया अवसर पावन,
स्नेह-विभोर घर का जन-जन,
हर्षित उमंग जागा हर मन,
आशीष छलकता है कण-कण,

नवज्योत घर पर छाई है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

ओढ़े सम्मान का दुशाला,
सौम्य, विनीत, स्फटिक प्याला,
मधु-प्रेम ने है उसको ढाला,
वो धीर, विवेकी, दक्ष बाला,

संस्कृति पग-पग लायी है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

जगदम्ब-सूर्य के कानन में,
विजया-भुवन के आँगन में,
सकल माधुर्य भर कर मन में,
इस मृदु-प्रकाश के प्रांगण में,

हर्षित श्रुति दी सुनायी है,
देखो! बेटी घर आयी है ।

यह कविता मेरी प्रिय भाभी के घर आगमन पर उनको समर्पित की गयी है।

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