purana daftar

ताले में वो बंद दफ्तर
उसमे बूढी वो कुर्सियाँ,
चुप से कोने में पिरोती
कर्कशी खामोशियाँ |

कब से हो के मौन बैठे
टाइपराइटर वो पुराने,
गूंजता था दफ्तर सारा
जिनकी खट-खट के बहाने |

धूल की मोटी परत अब
जिस्म हर ओढ़े हुए है,
सालों से वो peon भी तो
अपना मुख मोड़े हुए है |

जब भी पर्दों की सुराखें
किरणों को कभी आने देती,
खिड़कियों पर वो भी आके
ओस के आंसू बहाती |

कागज़ों के ढेर सारे
जाने कब से शांत बैठे,
मेज़ों के कमज़ोर पाये
बोझे से बर्बस हैं टूटे |

पीलेपन की ओढ़नी से
स्याह भी धुंधला गयी है,
दीवारों की सीलन से
एक बेबसी सी छा गयी है |

जब कभी झोंके हवा के
पानी के छींटे हैं लाते,
उड़ के ये बेबाक पन्ने
कमरे की चुप्पी चुराते |

कोई न अब खोलता है
बंद दरवाज़े के ताले,
ज़ंग भी अब लग गयी है
पड़ गए छेदों में छाले |

फिर भी वो रेशम से जाले
कमरे के कोनों से लग कर,
जीवन का संकेत देते
चांदनी में वो चमक कर |

जल के अब भी दीप कोई
बुनता नयी है कहानियाँ,
ताले में वो बंद दफ्तर
उसमे बूढी वो कुर्सियाँ ||

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