2186100-roots-of-the-broken-tree-ecological-catastrophe-volga-river-russia

यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

श्वेत जामा ओढ़े है विनाश,
भू बिछी है निर्दोषों की लाश,
अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास,
ढेर हुआ बेबस विश्वास,
न्याय बना मूरत है
कबसे मना रहा अवकाश,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

सूख रहा निर्झर का पानी
मलिन है हाय! निरीह जवानी
तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के
रिसता है बस लहू करों से
हर क्षण हर पल बिखर रही है
व्याकुल उर की हर आस,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश
पुरखों का खंडित अवशेष
उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख की
कटु ध्वनि बजती है शंख की
मोल भाव में पतित हुआ है
गौरवान्वित इतिहास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

चिर होता यहाँ चीर-हरण अब
धर्म भी सोता करवट ले तब
गांधारी बन पट्टी बाँध कर
अज्ञानी का स्वांग रचाकर
लुटने देते घर को अपने
कह कर हरि का रास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

वायु-संग बहता विध्वंश
क्षोभित है हर अंश-अंश
निष्ठा का होता लुप्त वंश
विष फैलाता छल-कपट-दंश
निसहाय बड़गद, नोच उसे
सब क्षीण करते हैं विकास,
मगर सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

चाहे जो हो, जैसा भी ढंग हो
श्वेत श्याम या जो भी रंग हो
हर कुछ है वहाँ स्वीकृत जन को
आत्म-केन्द्रित जहाँ हर जीवन हो
होता है ऐसे स्थानों पर
केवल दासों का वास,
क्यूंकि सब चलता है ।
यहाँ कहते हैं
कि सब चलता है ।

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