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(photo courtesy Himadri Mayank)

सूक्ष्म सी चिंगारी बन तू
टिमटिमा जुगनू के संग संग ।
ज्वाला का सामर्थ्य रख तू
अपने भीतर, अपने कण-कण ॥

नम्रता की लौ भी बन तू
जलती-बुझती, कम्पित अंग-अंग ।
सौम्य ज्योत हर ओर भर तू
रात्रि की कालिख में रोशन ॥

प्रेरणा की अग्नि बन तू
ज्वलित कर धरती का प्रांगन ।
आज अब कुछ ऐसे जल तू
प्रबुद्ध हो हर मन का आँगन ॥

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