2013-06-02_13.02.55[1]

उस रात बादलों के घेरे में
यूँही अकेले चलते चलते ।
आया एक Tissue Paper
कहीं से अचानक उड़ते उड़ते ॥

कुछ अधूरे शब्द
काली स्याही से लिखे हुए ।
धूलधूसरित कागज़ वो
किनारे ज़रा फटे हुए ॥

दिखता ना था कोई
उस सूनसान राह पर ।
फ़ेंका था किसी ने
इस tissue को जहां पर ॥

जेब में डाल कर वो tissue
घर की ओर मैं बढ़ी ।
कुछ दूर चौराहे पर
एक टूटी कलम भी थी पड़ी ॥

असमंजस में था मेरा मन
क्या हुआ इन दोनों संग ।
किसने ऐसे बर्ताव किया
किसने बिखेरा ये काला रंग ॥

पढने की जो कोशिश की
उन टूटे अक्षरों को ।
जोड़ ना सकी मैं
पानी से धुली लकीरों को ॥

सहसा टूटी निब कलम की
चुभी मेरे हाथ में ।
ध्यान कलम पर दिया तो देखा
जिस्म भी टूटा था साथ में ॥

देख कर लगता था उस
tissue-कलम को एक साथ ।
रात की कालिख में किसी ने
मिटा दी थी बनती बात ॥

गुस्से में किसी ने
उन्हें क्यों ऐसे तोडा था ।
इस घटना ने मुझे
अन्दर तक झंकझोड़ा था ॥

थाने तक जाऊं
या फिर पुलिस को बुलाऊँ मैं ।
किस तरह से अब
इस घटना की जांच कराऊँ मैं ॥

निर्णय किया फिर मैंने
पुलिस के पास जाने का ।
पर कोई भी अधिकारी मिला ना
मुझे वहाँ के थाने का ॥

घंटो तक मैंने वहाँ पर
उनके आने की प्रतीक्षा की ।
मुझसे मिलकर फिर उन्होंने ने
हर बात की समीक्षा की ॥

उन्होंने मुझसे कहा
जांच का आश्वासन देकर ।
‘जाओ और आराम से बैठो
तुम अब अपने घर जाकर ॥

घटना ये तुच्छ सी है
कोई बात बड़ी नहीं ।
यहाँ तो होता आया है
सदियों से ऐसा ही ‘ ॥

’tissue-कलम की दशा के पीछे
छुपा ये कैसा रहस्य ।
क्या दोषी को ढूंढना
नहीं है पुलिस का कर्त्तव्य?’ ॥

पुलिस की रूचि शून्य जान
मुझे बेहद दुःख हुआ ।
उनकी बातें सुनते सुनते
मेरा मन अति क्षुब्ध हुआ ॥

ठान ली मैंने फिर
स्वयं मदद करने की ।
अपराधी को ढूंढ कर
ये गुत्थी सुलझाने की ॥

अगली ही सुबह गयी मैं
पत्रकारों क कार्यालय में ।
मदद मांगी उनसे मैंने
इस घटना के विषय में ॥

कहानी को रोचक जान
सहायता का वादा कर के ।
उन्होंने फिर हाथ बढाया
अपने कलमों को नीचे रख के ॥

रूचि दिखाई उन लोगों ने
कलम और tissue से मिलने की ।
‘इस रहस्य को जानने का
तरीका है यही सही’ ॥

परिक्षण हुआ tissue-कलम का
सिलसिले चले सवालों के ।
प्रकाशित हुआ विस्तार से फिर
अगली सुबह अखबारों में ॥

केन्द्रित कर पुलिस का व्यवहार
कथा लिखी गयी थी सारी ।
पत्रकारों के गढ़े विचारों में
गौण हो गयी असल कहानी ॥

चर्चे बढे विवाद बढे
होने लगे संवाद बड़े ।
tissues ने निकाले मोर्चे
कलमों ने किये सवाल खड़े ॥

पत्रकारों की प्रसिद्धि बढ़ी
पुलिस के विरुद्ध अनशन हुए ।
दोषी को ढूंढ लाने के
प्रयास तब भी नहीं हुए ॥

भटका ध्यान लोगों का देख
न्यायालय के मैंने ठोके द्वार ।
वकीलों से प्रार्थना की
‘दोषी का तुम करो संहार’ ॥

‘गलत जगह तुम आई हो
ये काम हमारा नहीं ।
पुलिस के पास वापिस जाओ
दोषी ढूंढेंगे लोग वही’ ॥

‘पुलिस ने कोई मदद नहीं की
घोषित कर दी घटना तुच्छ ।
मूल्य क्या किसी जीवन का
इस दुनिया में यही, सचमुच?’

‘कर नहीं सकते हम कुछ भी
प्रश्न हमसे करो न तुम ।
सरकार से जाके मदद मांगो
कर सकती है अब वही कुछ’ ॥

निवेदन पत्र हाथ में लेकर
अगले दिन गई सरकार के पास ।
अचानक विपक्षी नेताओं को
लगी ये बात बड़ी ही ख़ास ॥

मुद्दे का आकार बढा अब
केंद्र तक गयी ये बात ।
पत्रकारों की कतार लग गयी
चाहे दिन हो चाहे रात ॥

नेताओं की कुर्सी हिल गयी
टुकड़ों में अब बंटा समाज ।
न्याय तो अब भी दूर था कोसों
पाना था सबको बस ताज ॥

दिलचस्पी तो सभी को थी पर
ढूंढता था ना दोषी कोई ।
स्वार्थ में अपने मद थे सब
भूल गए tissue-कलम को ही ॥

सरकार बदली, विचार बदले
नए मुद्दों के आकार बदले ।
पुरानो को सब भूल गए पर
व्यवस्था के व्यवहार ना बदले ॥

अर्थहीन व्यवस्था जान कर
अपने रास्ते चल दी मैं भी ।
जेब में डाला tissue-कलम को
उनकी अधूरी कहानी को भी ॥

भूल जाऊं मैं भी शायद
ये कहानी चलते चलते ।
धुंधला जाए मेरे मन से भी
वो tissue, जो आया उड़ते उड़ते,
वो कलम, जो कोई फ़ेंक गया था
यूँही राह में लिखते लिखते,
उस रात यूँही चलते चलते ॥

 

(समर्पित है उन सभी भूली हुई कहानियों को, सभी कागज़ के टुकडों और कलमों को, जिन्हें हम भूल के आगे बढ़ते आये हैं)

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