Search

Tissue Paper और कलम

Mirage

Image for post

I think you still exist
Or, do you, actually, not?
As image you persist
Reality says, you do not.

You build me, every night,
Story of colorful dream
Daylight fades the colors
Shredded bits scream

In receding light of day,
I weave from those shreds
Fabricate a picture of you
With the broken threads

It comes alive at times
Speaks to me at lengths
Colors my dreams again
Glues my weakening strengths

Your image is my reality
As real as it can be
You dwell in my present
And say, you will love me.

Featured post

The Goddess

Hampi 2020

Like pieces of blocks
I assembled her together
Gave her the looks
I wanted to see.

Took her apart.
Assembly repeated.
Chained her in images.
Never let her free.

Inner vision
And outer mirage
Made her the goddess
I wanted her to be.

Featured post

कैसे मैं पहचानूँ तुमको 

IMG_20200427_145537__01

कैसे मैं पहचानूँ तुमको?
कद, काठी या चाल से?
कैसे मैं पहचानूँ तुमको?
रंगत या बिखरे बाल से?

हाय! आँखों की पहले
गहराई क्यों नहीं नापी थी!
शायद! चेहरे पर खिलती
मुस्कान तुम्हारी काफी थी।

उफ़! इस मास्क ने मेरा
कर दिया है कैसा हाल ये।
कैसे मैं पहचानूँ तुमको?
कद, काठी या चाल से?

पहना था मास्क अभी तक
पर्दा नशीन और डाकुओं ने।
छुपाते थे पहचान जो अपनी
पहना था उन लड़ाकुओं ने।

आपदा कैसी आई ये कि
प्यार को बाँधा है रुमाल से
कैसे मैं पहचानूँ तुमको?
कद, काठी या चाल से?

इंद्र सा कोई फरेबी
कभी न धर ले रूप तेरा।
गौतम बन कर तू भी तब
अहल्या सा धड़ जड़ दे मेरा।

डरती हूँ हर पल मैं अब
ऐसे किसी ख्याल से।
कैसे मैं पहचानूँ तुमको
कद, काठी या चाल से?

रंग के प्रकार की सीमा
आखिर भला है क्यूं होती?
वरना अनोखा मास्क बना मैं
हाथ तुम्हारे धर देती।

फिर शायद कभी ना होता
जीवन में मेरे बवाल ये।
कि कैसे पहचानूँ तुमको
कद, काठी या चाल से।

गंध तुम्हारी खोई सदा
इत्र की भीनी खुशबु में,
बदलना न ये इत्र कभी तुम
पहचानूँ ताकि उससे मैं।

पर कंपनी बनाती होगी
कई बोतलें साल में।
हाय! कैसे पहचानूँ तुमको
कद, काठी या चाल से?

अँगुलियों की छाप लेने का
सेंसर नहीं है मेरे पास।
आवाज़ के थिरकन की भी तो
माप नहीं है मुझको याद।

रह-रह कर मन में मेरे
अब उठता बस है सवाल ये।
कैसे मैं पहचानूँ तुमको?
कद, काठी या चाल से?

ऐसा करो, तुम मुझे एक
पासवर्ड ही बना दे दो।
फेस रिकॉग्निशन फेल सही
क्रॉसवर्ड ही मेरे संग खेलो।

जवाब जिसका गुप्त रखें
बनाओ ऐसा सवाल ये।
ताकि मैं पहचानूँ तुमको
सदा उसी शब्द-जाल से।

Featured post

आज मैं बस एक अंक हूं !

lockdown-delhi-featured-e1585253957525 (1)
REUTERS/DANISH SIDDIQUI

आज मैं बस एक अंक हूं ।
बड़ी सी गिनती का एक छोटा अंग हूं ।
मेरी पहचान बस नंबरों में है,
मेरा अस्तित्व बिखरा आंकड़ों में हैं ।।

कल तक मेरा एक नाम था,
छोटा ही सही, एक अभिज्ञान था ।
मेरे परिचित मेरा सम्मान करते थे,
मेरे व्यक्तित्व का संज्ञान करते थे ।।

आज मैं बस एक अंक हूं ।
बड़ी सी गिनती का एक छोटा अंग हूं ।
मेरे पड़ोसी मुझसे कतराते हैं,
परिजन भी डरे से नजर आते हैं ।।

कल तक मैं एक मजदूर था,
अदृश्य था, परिवार से दूर था ।
फिर भी अपने काम में व्यस्त था,
दीन था, पर सशक्त था ।

आज मैं बस एक अंक हूं ।
बड़ी सी गिनती का एक छोटा अंग हूं ।
लोगों से मिले दान पर मजबूर हूं,
मीलों चल कर भी परिवार से दूर हूं ।।

कल तक मैं एक डॉक्टर था,
जीवन दायक चिकित्सक था ।
जीवन-मृत्यु से निरंतर जूझता था,
रोगों की पहेलियाँ रोज़ बूझता था ।।

आज मैं बस एक अंक हूं ।
बड़ी सी गिनती का एक छोटा अंग हूं ।
सीमित संरक्षण लैस, दिन-रात लड़ता हूं,
फिर भी मैं पत्थरों की मार सहता हूं ।।

कल तक मैं एक किसान था,
गरीब था, पर बलवान था ।
टोकरियों में भर कर सेहत बेचता था,
जो कम पड़ जाएं तो धूप सेंकता था ।।

पर आज मैं बस एक अंक हूं ।
बड़ी सी गिनती का एक छोटा अंग हूं।
फल-अनाज अब नाली में सड़ रहे हैं,
बच्चे अब भूख की बीमारी से मर रहे हैं ।।

Featured post

क्यूंकि मैं कोरोना पॉज़िटिव हूं

ITALY-HEALTH-VIRUS
(Photo by Piero CRUCIATTI / AFP) (Photo by PIERO CRUCIATTI/AFP via Getty Images)

 

मेरा नाम शायद आपको पता नहीं होगा,
जहां अस्पताल मिले मेरा पता वहीं होगा।
केस नंबर २०४१ पुकारता हर कोई है,
जाति और धर्म का संज्ञान ना कोई है।

परिवार जन को हफ्तों में नहीं देखा है,
जैसे खिंची हमारे बीच लक्ष्मण की रेखा है।
अब वो मुझसे मिलने नहीं आते हैं,
बस फोन से ही हाल चाल पूछ जाते हैं।

पति भी मुझे देख कर मुंह ढक लेता है,
६ फीट की दूरी की हर बार सबक देता है।
डॉक्टर्स और नर्सेस भी मुझसे कतराते हैं,
मेरी हर सांस पर मुझसे दूर हो जाते हैं।

सहकर्मी मुझसे भयभीत से दिखते हैं,
नर्स से ही हाल जान कर निकल लेते हैं।
मेरी हर वस्तु, लोग सचेत हो छूते हैं,
अब तो लोग मेरे परिवेश से भी रूठे हैं।

आज मेरा हर रिश्ता अमान्य हो गया है,
मेरा अस्तित्व भी मुझसे अनजान हो गया है।
मृत्यु के बाद भी में अछूत ही मानी जाऊंगी,
अंतिम झलक के भी अयोग्य बन जाऊंगी।

संभवतः कोई मेरी राख तक ना उठाएगा,
हाय! ये बीमारी सद्भाव भी खा जायेगा।
जीवित होते हुए भी मेरा जीवन निर्जीव है,
क्यूंकि मेरा शरीर कोरोना पॉज़िटिव है।

 

WhatsApp Image 2020-06-08 at 05.39.57

Featured post

दीवारें

img_20160911_173407693_hdr

माना कि थे वो ग़लत
और क्रूर अपरम्पार थे ।
दोषों से वो युक्त थे और
पाप के भरमार थे ।।

किन्तु दीवारें बना, क्या
हमने हत्याएं न कीं?
जो हमारे कर हुई,
वो न्याय कैसे कब हुईं?

क्या दीवारें बनने से
आयी कभी कहीं शांति है?
भूत के पन्ने पलट लो,
इनसे हुई बस क्रांति है!

Featured post

It lived for a day

75349227_2556706401051289_6980911258512961422_n

He groomed it with wonders of love and spades,
It bloomed, it flowered with yellow as shades.
It was loved, it flourished
It glowed, it was cherished.
It passed, it swayed, from hand to hand
Flaunting its beauty, with whispers of demand.

And now, fractured, it lies, in a corner
Spine fragmented and no beauty armour.
Ephemeral was fragrance, scattered is softness
Breathing the last, aloof and thoughtless
It wilted in water, unuttered, astray
It bloomed, it flourished, it lived for a day.

Featured post

नाम से पहचान

Some_Indian_cities_and_states_that_have_been_renamed_in_the_20th_and_21st_centuries
Graphic courtesy: The Times of India

एक रोज़ मुझे एक चिट्टी आयी,
‘सालों से तूने, न शक्ल दिखाई,
आकर मिलो इस दफ्तर से तुम,
साथ में लाना चंदन कुमकुम।’
 
पहचान पत्र ले जो मैं पहुंची,
अफसर ने देखा, ली एक हिचकी,
कहा, ‘नाम तेरा पसंद न आया
आज से तू कहलायी माया।’
 
मैंने फिर आपत्ति जताई,
‘ये कौन सा नियम, मेरे भाई?’
‘नियम? ये कौन सी है चिड़िया?
भावना के बल चले है दुनिया।’
 
‘भावना आपकी पर जीवन मेरा,
नाम बदलना कठिन है फेरा।
बदलना होगा हर दफ्तर में,
घिसेंगे जूते इस चक्कर में।’
 
‘नाम तो तेरा माया ही है,
युगों से नारी की छाया यही है। 
मान ले अब तू बात ये मेरी
तभी संस्कृति से पुनः जुड़ेगी।’
 
‘संस्कृति और युगों की बातें करते,
पर मेरी ना बात समझते।
नाम से क्या इंसान बदलता?
आवरण से क्या पहचान बदलता?’
 
‘पहचान तो तेरी वही है, लड़की!
जो मैंने इस पर्ची में लिखी। 
और आवरण से याद है आया,
पहन वो जिससे दिखे न काया।’
 
‘ये क्या बात हुई, अफसर जी,
मुझे स्वतंत्रता है जीने की। 
निर्णय कैसे किया आपने?
नाम आवरण बदले हैं झट में।’
 
‘इस दफ्तर का अधिकारी मैं,
जानूँ क्या है तेरे हित में। 
तेरे कल को मिटा के अब मैं,
हटा रहा हूँ कालिख जग से। 
 
माया बन जब परिचय देगी,
परंपरा की तू प्रति बनेगी। 
सोच वो कैसा जीवन होगा, 
जब सीता सा स्थान मिलेगा।’
 
‘वो जीवन जाने कैसा हो,
आज जो मैं हूँ वो तब न हो। 
कहानी गूंथ कर के रोज़ की,
बनाई है अपनी मैंने यह छवि। 
 
मिटा जो दोगे मेरे कल को,
जुड़ेगा कैसे मेरा परसों?
बात मेरी तुम अब ये समझो,
नाम छोड़, यह दृष्टि बदलो। 
 
कहो मुझे सीता या माया,
नाम वही जिसे अपना पाया। 
नाम में न तो कल रखा है,
न संस्कृति का पर्चम रखा है। 
 
मुझे जो उन्नत करना तुमको,
तो उस राह का मुख तुम धर लो। 
जगत में नाम तभी बनता है,
जब विकास यौवन चढ़ता है।’
Featured post

भूल जाओ मुझे

babri_masjid_anfl1a

भूल जाओ मुझे,
क्यूँ मेरे लाश को बार बार जगाते हो?
क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो?
मेरे साथ ही तो उस सभ्यता का अंत हो गया था
फिर क्यूँ उन कहानियों को तुम हर बार दोहराते हो?
क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो?

भूल जाओ मुझे,
मैं बस एक अतीत का टुकड़ा ही तो हूँ
जिससे भाग्य रूठा था वो एक मुखड़ा ही तो हूँ
फिर क्यूँ मेरे स्वामित्व का स्वांग लगाते हो?
क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो?

भूल जाओ मुझे,
चमकता हुआ मेरा वो चरम डूब चूका है
प्रसिद्धि का हर राग मुझसे ऊब चूका है
फिर क्यूँ सूरज और चाँद से मुझे सजाते हो?
क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो?

भूल जाओ मुझे,
कि अब मुझे चैन से सोने दो
किस्सों की परतों में अब मुझे खोने दो
क्यूँ लड़-लड़ के मेरी रूह को डराते हो?
क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो?

(सन्दर्भ : उन सभी स्मारकों की ओर से जिनके नाम पर इंसान आपस में लड़ाई करते आ रहे हैं। )

Featured post

स्वरूप

img_20180207_085949_2.jpg

 

मैं जब भी देखूँ दर्पण में,
कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।
ये स्वरूप मेरा है या रूप तेरा,
मैं सोच रही मन ही मन में।।

चादर की सफेदी में अपने,
है लगा मुझे भी तू ढकने।
एक परत चढ़ी मेरे तन में,
कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

है धुआँ धुआँ फैला नभ में,
आंधी है खड़ी सागर तट पे।
न नियंत्रण है अब किसी कण में,
कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

आकृतियों से सज्जित प्रांगण है,
विकृतियाँ भी मनभावन हैं।
परिवर्तन है अंतर्मन में,
कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।।

Featured post

मारीच की खोज

684px-The_Fascination_of_Spinning_lights_(6611717083)

मैं धरा के जंगलों में
ढूंढता मारीच, देखो !
बिछड़े लक्ष्मण और सीता
मुझसे किस युग में, न पूछो !

एक उसकी खोज में
वर्षों गए हैं बीत मेरे।
अब उपासक बन गए हैं
उसके ही सब गीत मेरे।

मृग बना था स्वर्ण का वह,
किसी युग में ज्ञात मुझको।
अब तो अनभिज्ञ सा मैं
ढूंढता हर पात उसको।

मन है उसका बंधक कि
मोहन में है जीवन बिताये।
किन्तु न अस्तित्व उसका
किसी भी क्षण में जान पाए।

कौन है वह, क्या है कि
वह समक्ष भी है परोक्ष भी है।
पाने से उसको ही, अब तो
तय हुआ मेरा मोक्ष भी है।

वन गगन और पर्वतों पर,
हर दिशा में ढूंढता हूँ।
‘सत्य क्या मारीच की?’
प्रश्न यह ही पूछता हूँ।

थक गया हूँ, चूर हूँ मैं,
मोह से मजबूर फिर भी।
कर दूँ कैसे अंत मैं मारीच,
और इस खोज की भी।

फिर कभी जब देखता हूँ,
मैं जो अपने मन के अंदर।
पाता हूँ मारीचों के
जाने कितने मैं समंदर।

क्या यही अब तथ्य है कि
जब तक हैे जीवंत आशा।
अंत न होगा मनस में,
मारीच की जी है पिपासा।

Featured post

ठण्ड की कहानी

DSC06038

यूँ तो हर मौसम की अपनी मनमानी होती है,
पर ठण्ड की एक दिलचस्प ही कहानी होती है।
धुंध से भीगी रातें तो रूमानी होतीं हैं,

पर दिसंबर में सर्दी दंतकड़कड़ानी होती है॥

ठण्ड अपनी चादर हर ओर कुछ ऐसे फैलाता है,
नाड़ी का खून enzyme नहीं, तापमान जमाता है।
गर्मी की deficiency में रोज़ कौन नाहता है,

यह जान कर deodorant मन ही मन इतराता है ॥

सर्दी अपने प्रस्ताव से हमारी हैरानी उकसाती है ,
इस मौसम में आँसू हमारी नाक बहाती हैं,
ठण्ड से कांपते कदमों को आग की गर्मी जमाती है

रजाई refugee camp सी नज़र आती है ॥

मन पर अद्भुत सा एक प्रभाव पड़ता है,
घर की दहलीज़ लांघने में ये घंटों तक डरता है,
सहम कर ये muffler का बंटवारा करता है,

Pant के खली कोने भी thermals से भरता है ॥

तभी उँगलियों व् नाक पर ठण्ड की मार क्रूर पड़ती है,
कपडे चार न चढ़ाओ तो संतुष्टि भी आने से डरती है।
बेरुखी से हवा जब गालों पर दो तमाचे जड़ती है,

गालों की लालिमा exponential rate से बढती है ॥

heater की आग से चिढ कभी fire alarm बज जाता है,
और तब मन एक गहन उलझन में पड़ा जाता है,
Jacket और आग में priority तय न कर पाता है

इसी उधेड़बुन में कीमती वक़्त निकल जाता है ॥

इन्ही कुछ असमंजसो से भीगी पेशानी होती है,
अपनी helplessness पर हमको आप ही हैरानी होती है।
दोहराई जाने वाली ये कहानी पुरानी होती है,

ठण्ड की भी अजीब ये कहानी होती है ॥

 

(यह प्रसन्नचित कवीता अनुराग कनौजिआ के सहयोग में लिखी गयी है)

 

Featured post

शिखरों के पार

IMG_20170708_123821

हृदय को अकुलाता ये विचार है,
दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है,
बसता क्या शिखरों के उस पार है।

उठती अब तल से चीख पुकार है,
करती जो अंतः में चिंघाड़ है,
छुपा क्या शिखरों के उस पार है।

हृदय को नहीं ये स्वीकार है,
क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है ,
जाने क्या शिखरों के उस पार है।

तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है,
भू पर धरोहर का अंबार है,
देखो क्या शिखरों के उस पार है।।
Featured post

शब्दों का हठ

IMG_20170604_195929
शब्दों ने क्यूँ आज न जाने
भुरभुरा सा एक रूप धरा है,
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है,
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है,
आज अनुपम कुछ करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है।

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है स्वप्न से बनना,
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं।
कहते हैं मुझसे कि एक
थिरकती लौ की आस सा बनना,
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं।

कविताओं के छंद बना जब
पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा,
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र से मैंने फैलाना चाहा,
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर।

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है,
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा नई गढ़ना है,
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है,
शायद, उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है।।

 

Featured post

अरण्य का फूल

IMG_20171007_144115

बेलों लताओं और डालियों
पर सजते हैं कितने,
रूप रंग सुरभि से शोभित
कोमल हैं ये उतने।

असंख्य खिलते हैं यहाँ
और असंख्य मुरझाते हैं,
अज्ञात और अविदित कितने
धूल में मिल जाते हैं।

दो दिन की ख्याति है कुछ की
दो दिन पूजे जाते,
फिर कोई न पूछे उन्हें
जो वक्ष पर मुरझा जाते।

जग रमता उसी को है
जो फल का रूप है धरता,
अरण्य का वो फूल मूल
जो पेट किसी का भरता।।

Featured post

काव्य नहीं बंधते

IMG_20171006_131213

शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं,
स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते।
हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं,
किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते।
मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ,
पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते।
उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

अंतः में अटखेलियाँ तो भाव करते हैं,
किन्तु बन अभिव्यक्ति वो मुझसे नहीं रिसते।
ले निरंतर रूप वो मुझसे नहीं बहते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

न कोई ज़ंजीर न बाधा की बंदी मैं,
मनस से क्यों उदित हो तब काव्य नहीं बंधते।
साहित्य के नव संस्करण का पथ नहीं गढ़ते,
जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।।

Featured post

शब्दों का हठ

words1

शब्दों ने आज न जाने क्यूँ
भुरभुरा सा एक रूप धरा है।
सुबह से कमरे के कोने में
उन्होंने सबको घेर रखा है ।
अंतहीन नभ में उड़ने का
हठ ऐसा मन में पकड़ा है ।
आज कुछ अलग करने का
दृढ़ निश्चय किया पक्का है ॥

कविताओं की छंद बना जब
पतंग से मैंने उड़ाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ आप ही
बिखर गए धागे से खुलकर ।
पद्य के रस में पीस कर जब
इत्र सा  मैंने फैलाना चाहा ।
तो इनमें से कुछ स्वयं ही
लुप्त हुए बादल में घुलकर ॥

कहते हैं मुझसे कि एक
बच्चे की है आस से बनना ।
जो पक्षियों के पैरों में
छुपकर घोंसले बना लेते हैं ।
कहते हैं मुझसे कि एक
फकीर की है दुआ सा बनना ।
जो उजड़ती साँसों को भी
हौसला देकर जगा देते हैं ॥

अब उन्हें न ही किसी श्लोक
न किसी आयत में बंद होना है ।
अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की
परिभाषा एक नई गढ़ना है ।
संचार के जो टूटे तार हैं
पुनः संलग्न उन्हें करना है ।
शायद उन्हें द्वेष पर फिर से
प्रेम का टूटा रत्न जड़ना है ॥

Featured post

कल्पना की दुनिया

dsc05319

यथार्थ की परत के परोक्ष में,
कल्पना की ओट के तले,
एक अनोखी सी दुनिया
प्रेरित, अबाध्य है पले।

चेतन बोध से युक्त
सृजन के सूत्रधारों की,
अनुपम रचनाओं
और उनके रचनाकारों की।

सृजन फलता है वहाँ
विचारों के आधार पर।
उत्पत्तियाँ होतीं हैं
भावना की ललकार पर।

सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ
ह्रदय को निचोड़ने मात्र से,
हर तृष्णा सदृश हो जाती है
अंतः के अतल पात्र से।

इसके उर में जीते वो जीव
रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं।
कभी उद्वेग से भर कर
एक आंदोलन छेड़ जाते हैं।

कल्पना के उस पार जाने का,
यथार्थ को वक्ष से लगाने का,
ह्रदय की नाड़ियों से निकल कर
मस्तिष्क में बस जाने का।

कल्पना और यथार्थ के क्षितिज पर तब
एक अलग ब्रह्माण्ड रचता है।
जहाँ कल्पित वास्तविकता बन कर
फलीभूत होता है।

जल के वेग से बहते विचार,
चट्टान तोड़, नया पथ गढ़ते हैं।
नैत्य का ढांचा तोड़,
विस्तृत एक रूप धरते हैं।

विचारधारा के नए मार्ग पर
ज्ञान उसका अनुसरण करता है।
और कल्पना की ओट में
एक नव प्रकरण चलता है॥

Featured post

पत्तों की बरसात

b9c829df4cca38b0e6756eeede310d11

आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ।
अंगड़ाई लेती थी सुबह
औंधी गहरी रात हुई थी ॥

पक्षी भी सारे अब चुप थे,
घोंसलों में बैठे गुमसुम थे,
कैसी ये घटना उनके संग
यूँही अकस्मात् हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

सूरज की अब धूप भी नम थी,
तपिश भी उसमें थोड़ी कम थी,
स्थिति बनाती और गहन तब
तेज़ हवा भी साथ हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

शर्म छोड़ सब पेड़ थे नंगे,
टेढ़े मेढ़े और बेढंगे,
झड़प हुई थी उनमें या कि
पत्तों की बरसात हुई थी ।
आँख खुली तो देखा मैंने,
रात अजब एक बात हुई थी ॥

Featured post

बिम्ब

dsc05468

रेल गाड़ी के डिब्बों में अब
नव संवाद कहाँ खिलते हैं,
कभी जो आप से बात हुई तो
जाना मित्र कहाँ मिलते हैं।

शीशे पर उभरे चित्र जब
आप ही आप से बोल पड़ते हैं,
अंतः के बेसुध पड़े कोने
धीमे-धीमे रस भरते हैं।

सोये स्वप्न जब बेड़ी तोड़ें,
तभी तो जड़ अपने हिलते हैं,
कभी जो आप से बात हुई तो
जाना मित्र कहाँ मिलते हैं।

Featured post

पतझड़

IMG-20160904-WA0000

कल्पना करो, कुछ दिनों में
ये बंजर हो जायेंगे।
ये हवा के संग लहलहाते पत्ते,
अतीत में खो जायेंगे॥

जब बारिश की बूंदों में
ये पत्ते विलीन होंगे।
क्या अश्रु में लिप्त
तब ये कुलीन होंगे?

विरह की ज्वाला में क्या
ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे?
या नवजीवन की प्रतीक्षा में
यूँही अटल रहेंगे?

क्या हवा के थपेड़ों में
झुक कर, टूट मरेंगे?
या चिड़ियों के घोंसलों का
फिर ये आशियाँ बनेंगे?

शायद, यूँहीं,
सभ्यताओं का अंत होता है।
या शायद,आरम्भ ही
इस अंत के परांत होता है॥

Featured post

ईर्ष्या या प्रेम

2011-11-15_2254
https://www.emaze.com/@AFTOILZR/Muscle-Short-Story

मैं कथा कहूँ दो प्रेमियों की
जो सदा संग ही विचरते थे ।
पर एक-दूजे से बिना मिले
निर्बल से, अाहें भरते थे ॥

एक शाम अनोखी की बात हुई
ईर्ष्या से प्रेमिका हताश हुई ।
सूची शिकायतों की खोली
प्रेमी से अथाह निराश हुई ॥

मायोसिन:
‘तू कहता तुझे मैं हूँ पसंद
फिर क्यूँ सबसे अाकर्षित तू?
तू अर्थ इस मैत्री का अब बता
है किस मिट्टी से निर्मित तू?’

एक्टिन:
‘अाकर्षण? अाखिर वो क्या है?
मेरे भाव तो सारे सम्मुख हैं ।
हे प्रिय! तू मेरी बात समझ
मैं तेरी ओर ही उन्मुख हूँ ॥

क्यों भूमिका मेरी न समझे तू?
मैं तो बस एक संबंधक हूँ ।
लक्ष्य तो मेरा उर्जा-जनन
बस पात्र रूपी मैं दर्शक हूँ ॥

तुझसे ही पाकर शक्ति मैं
दूजों तक हाथ बढ़ाता हूँ ।
फिर जोड़ के सारे कण-कण मैं
कोशिका का रूप बनाता हूँ ॥

कोशिकांगों को स्थिरता मिलती है
मेरे यूँ हाथ पकड़ने से ।
फिर क्यूँ उलाहना करती हो
तुम झूठ-मूठ आकर्षण के ?’

मायोसिन:
‘हर चाल मैं तेरी समझती हूँ
ये कहानियाँ मुझे तू न ही सुना !
सम्बन्धन के विचित्र अाड़ में तू
करता पूरा अपना सपना॥’

एक्टिन:
‘सपना मेरा तो तुम ही हो
इस बात को क्यों न समझती हो?
मैं सदा रहा हूँ साथ तेरे
फिर भी ये प्रश्न तुम करती हो !

कोशिकाओं का मैं ढाँचा हूँ
इस बात से हो न अवगत तुम?
कण-कण को जोड़ के ढाँचा बने
फिर क्यों मुझसे हो क्रोधित तुम?

संगठन का ही तो कार्य मेरा
मैं जोड़ू नहीं तो क्या मैं करूँ?
प्रयोजन जो मेरा कोशिका में
बिन हाथ धरे कैसे पूर्ण करूँ?’

मायोसिन:
‘समझती हूँ प्रयोजन मैं तेरा
पर द्वेष मैं कैसे दूर करूँ?
ये प्रेम जो तेरा समानांतर है
उसे छल नहीं तो क्या समझूँ?’

एक्टिन:
‘हे प्रिय समझो मेरी दुविधा को
ये छल नहीं, ये धर्म मेरा ।
संभाल के सबको रखना ही
है प्रथम लक्ष्य और कर्म मेरा ॥

मैं करूँ कुछ भी, जाऊँ मैं कहीं
न छोड़ूं तेरा मैं हाथ कभी ।
कोशिका-कोशिका या कोशिका-धरा
हर मिलन में तू ही साथ रही ॥

जब ऊर्जा मुझको पानी थी
तू ही तो संग मेरे खड़ी रही ।
पूरक हैं हम एक दूजे के
तुझ बिन मुझ में शक्ति ही नहीं ॥

समझता हूँ मैं तेरी ईर्ष्या को
तेरे प्रेम का भी अाभास करूँ ।
इसलिए तो तेरे संग ही मैं
कोशिका का रूप विन्यास करूँ?

अब उठो हे प्रिय! न रूठो तुम
कि व्यर्थ ये सारा क्रन्दन है ।
कोशिकाओं की क्षमताओं का
आधार हमारा बंधन है ॥

मायोसिन:
तुम ठीक ही कहते हो हे प्रिय!
कि असीम प्रेम हम में लय है ।
फिर भी न जाने क्युँ मुझमें
इसकी असुरक्षा का भय है ॥

एक्टिन:
वो प्रेम कहाँ भला प्रेम हुअा
जिसमे ईर्ष्या न व्याप्त हुई ।
तनाव प्रेम का जहाँ रुका
समझो, अवधि भी समाप्त हुई ॥

निराश न हो हे प्रिय तुम यूँ
ईर्ष्या से ऊर्जा निर्मित होगी ।
फिर ऊर्जा के हर कण-कण से
कोशिका अपनी विकसित होगी ॥

कि प्रेम ये अपना ऐसा है
जो विकास का मूल आधार बने ।
कि इसी प्रेम की दीवारों से
संगठित कोशिका का संसार सजे ॥

सन्दर्भ – यह कविता मैंने अपने शोध के नए विषय से प्रभावित होकर लिखी है। कोशिकाओं में कई प्रोटीन्स होते हैं जो कोशिका का ढाँचा (skeleton) बनते हैं। उनमें से दो प्रोटीन्स हैं: एक्टिन और मायोसिन। कोशिका में एक्टिन के फिलामेंट्स होते हैं जो मायोसिन के हेड से जुड़ते हैं । ATP की सहायता से मायोसिन का हेड एक निर्धारित दिशा में घूमता है और एक्टिन का फिलामेंट उसके साथ विस्थापित होता है। इस विस्थापन के से कोशिका से सिकुड़ती या फैलती है। कोशिका की कई प्रक्रियाएँ इसी घटना से नियंत्रित हैं।
इन दोनों प्रोटीन्स का मानवीकरण कर के मैंने यह काव्य लिखा है। यहाँ एक्टिन और मायोसिन को मैंने प्रेमियों के रूप में प्रस्तुत किया है। चूँकि प्रक्रियाओं के को पूर्ण करने के लिए एक्टिन(प्रेमी) कई दूसरे प्रोटीन्स से जुड़ता है, मायोसिन (प्रेमिका) एक दिन उससे नाराज़ हो जाती है। इसी ईर्ष्या में मायोसिन एक्टिन को शिकायत करती है कि वो ऐसा क्यों करता है। और एक्टिन इस व्यवहार को स्पष्ट करता है। ये कविता इन दोनों के इसी संवाद पर आधारित है।

Featured post

बढ़ चलें हैं कदम फिर से

IMG_7869

छोड़ कर वो घर पुराना,
ढूंढें न कोई ठिकाना,
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।

ऊंचाई कहाँ हैं जानते,
मंज़िल नहीं हैं मानते।
डर जो कभी रोके इन्हें
उत्साह का कर हैं थामते।

कौतुहल की डोर पर
जीवन के पथ को है बढ़ाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

काँधे पर बस्ता हैं डाले,
दिल में रिश्तों को है पाले।
थक चुके हैं, पक चुके हैं,
फिर भी पग-पग हैं संभाले।

खुशियों की है खोज
कि यात्रा तो बस अब है बहाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

जो पुरानी सभ्यता है
छोड़ कर पीछे उन्हें अब।
किस्से जो बरसों पुराने
बच गए हैं निशान से सब।

की नए किस्सों को पग-पग
पर है अपने जोड़ जाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

कोई कहे बंजारा तो
बेघर सा कोई मानता है।
अनभिज्ञ! अज्ञात से परिचय
का रस कहाँ जानता है।

जोड़ कर टूटे सिरों को,
विश्व अपना है रचाना।
बढ़ चलें हैं कदम फिर से
छोड़ अपना आशियाना।।

Featured post

सैंतीस केजी सामान

IMG_20160531_231649
फोटो सौजन्य: मृणाल शाह

छितराई यादों से अब मैं
सैंतिस केजी छाँटूं कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

बाँध भी लूँ मैं नर्म रजाई
और तकिये को एक ही संग
और लगा कर तह चादर को
रख दूँ उनको एक ही ढंग

बिस्तर की सिलवट से पर मैं
सपनों को छाँटूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

ढेर किताबों की दे दूँ मैं
किसी कनिष्ठ के घर पर भी
बेच मैं दूँ पुस्तिकाऐं अपनी
व्यर्थ सारी समझ कर भी

पर ज्ञान के रस को अब
मैं पन्नों से छानूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

कपड़े पुराने और जूतों को
दान कहीं मैं कर भी दूं
तस्वीरों के संग्रह को मैं
डब्बों में यदि भर भी दूं

पर यात्राओं के अनुभव को
चित्रित कर डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

कागज़ पर लिखे शब्दों को
छपवा दूँ मैं पुस्तक में
मित्रों के उपहारों को
सहेज रखूँ प्रदर्शन में

पर प्रेम के इंद्र-धनुष को
बस्ते में डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

बड़गद से टूटे पत्तों को
रस्ते से मैं चुन भी लूँ
और पुरानी राहों को मैं
आँखों में यदि भर भी लूँ

किन्तु हास से युक्त क्षणों की
आवृत्ति कर डालूँ कैसे?
सात साल के जीवन को
एक बक्से में बाँधूँ कैसे?

Featured post

Plastic deformation

IMG_20160221_101136088 (2)
Courtesy: My birthday gift from a few dear friends

Yesterday, while walking,
I wrote some words in ink.
Some were bitter, harsh
Some rosy, lovely, pink.

Some warm and touching,
I poured from my heart.
Some reckless, careless,
Roughly scribbled, apart.

Some truth laden emotions,
Carefully weaved together.
Some shallow, unsettling,
Bound with a tether.

I sprayed my raw ideas.
Brewed them to unwind.
I laid some soft musings
Of a wandering mind.

I also sketched in ink
the faces that I met.
Wrote their names beneath
In case, I forget.

Last night, then, I slept,
Kept my pen aside.
Sleep flushed my writings
Left smudges behind.

Impressions of the nib
Stayed deep and dark.
Memories were tattered
Left was just the mark.

Deformations imbued
deeper inside me.
Shaping the face in mirror
That my eyes will see.

Featured post

वोट बनाम नोट

चित्र श्रेय: डीएनए इंडिया
चित्र श्रेय: डीएनए इंडिया

निर्वाचन का बिगुल बजा,
मच रहा था हाहाकार,
गली-गली हर घर-घर में,
मने उलझन का त्यौहार।

“किसे चुनें, किसे सत्ता दें?”
हर ओर था यही विवाद,
हर भेंट, हर चर्चा का,
बस चुनाव ही था संवाद।

ऐसे में एक धूर्त नोट ने,
लगाई एक वोट से स्पर्धा,
“जग में किसकी माँग अधिक?
किसकी है अधिक महत्ता?”

शास्त्रार्थ का सेज सजा,
न्यायाधीश प्रतिष्ठित आये,
श्रोताओं में था कौतुहल,
“विवाद क्या रंग दिखलाये?”

नोट ने बड़ी तैयारी की,
व्यवसायी सभी बुलाये,
नोट के पक्ष से तर्क सुनाने
संग वो अनुभव लाये।

वोट ने भी व्यवस्था में
कोई चेष्टा न छोड़ी,
नेताओं के भाषण में
अपनी उपलब्धियाँ जोड़ीं।

मोर्चे निकाले पक्षों ने
विपक्षों को दुत्कारा,
प्रश्न एक ही करते थे सब,
“कौन है किसको प्यारा?”

तभी मंच पर जा नोट ने
गुहार ज़ोर की लगाई,
“कौन यहाँ समझे मुझे अपना,
किसका मैं बड़ा भाई?

जिसको भी यहाँ प्रेम हैं मुझसे,
जो मुझे अपना समझे,
नाम मेरा एक पर्चे में वो
अब चुपके से भर दे।

याद रखें अब सभी कि
मैं ही हूँ पालनकर्ता,
मैं ही पोषण करता हूँ
और मैं ही हूँ दुःख हरता।

दुनिया मुट्ठी में है तेरे
जब तक मैं तेरे संग हूँ,
जब भी चाहूँ सपने तेरे
रंगों से मैं भर दूँ।”

बारी आई वोट की फिर,
वो नम्र भाव से बोला,
“जानता हूँ, सुन नोट की बातें
सबका ह्रदय है डोला।

जानता हूँ कि नोट से ही
चलती है दुनिया सारी,
नोट नहीं तो फूल ही क्या
मुरझा जाती है क्यारी।

किन्तु तुम न भूलो कि
नोटों की भी सीमा है,
असली बल देता है वही
जो मत-प्रतिनिधि होता है।

माना न दे सकता मैं
तुमको भोजन और पानी,
पर राय को तेरे
मैं ही दे सकता वाणी।

वोट तराशते हैं देशों के
आने वाले कल को,
करते हम हीं हैं निश्चित कि
कैसी उनकी शकल हो।

जो दोगे वोट तुम अपना
प्रगतिशील किसी मन को,
उन्नत होगा देश-समाज
फिर जेब में धन ही धन हो।

मूल्य मेरा अब समझो,
जो मैं न तो हूँ तो क्या है,
मुझसे ही जीवन में तुमको
मनचाहा मिलता है।

मुझसे ही तो व्यक्त है होती
चाह तुम्हारी जग में,
मैं न हूँ तो तेरे अंदर
घुट जायें वो रग में।

घुट जाये तू भी उनके संग,
चुन न सके जो सही है,
मेरा मोल जो समझ सके
परिवर्तन लाते वही हैं।”

सुनकर वोट की बातें
जैसे क्रान्ति आई भवन में,
जैसे छोड़ गया सेना को
बिन नेता कोई रण में।

नोट को भी एहसास हुआ
कि उसकी सत्ता डोली,
हार तो उसकी निश्चित है
जैसे ही जनता बोली।

चुपके से फिर जीतने की
नयी युक्ति उसने लगाई,
नोटों की थैलियाँ भर-भर
लोगों में बँटवायीं।

दे सुविधा का लालच सबको
अपनी ओर था खींचा,
धन-लोभ में समर्पण कर तब
विवेक भी आखें मींचा।

भेड़ों जैसी चाल में चल दी
जनता महत्ता चुनने,
नोट को दे कर मूल्य अधिक
उसे दे दी सत्ता बुनने।

सत्ता बनी जब माया की
तब स्वार्थ ने सबको घेरा,
हर ओर लग गया निरंकुश
अर्थ-वाद का फेरा।

कठोर हुआ हर ह्रदय और
थी तानाशाही जग में,
हुआ अधीन हर व्यक्ति और
अब बेड़ियाँ थी पग-पग में।

बल एकत्रित हुआ कुछ कर में
और सभ्यता डोली,
बँटता-टूटता समाज,
खेलता था खून से होली।

मोह की पट्टी बाँध धनी
अब चूस रहे थे धन को,
निर्धनता के अथाह गर्त में
भेजते थे हर जन को।

विवेक जगा तब जनता का
विरोध का किया इरादा,
पर वाणी अब सुने न कोई
न ही नर, न मादा।

देख असहाय स्थिति को अपनी
निर्धन जनता रोई,
कैसी घड़ी है आई कि
अब मदद करे न कोई।

मदद करे न कोई अब मैं
किसकी आस लगाऊँ?
तड़पाती मुझको जो हर क्षण
प्यास वो कैसे बुझाऊँ?

“मदद जो की तुमने न अपनी
जब वक्त के रहते,
तब खेतों के लुट जाने पर
अब क्यों आंसू बहते?

क्यूँ विवेक को मारा जब
कल अपने हाथों था?
क्यूँ नहीं वोट को मूल्य दिया
जब बल अपने हाथों था?

अब तो जाग कि कल फिर से
है वोट तुझे ही करना,
ठान ले तू इस बार कि तुझको
धन हाथों न मारना।

वोट के बल को जान ले तू
कि यही है बल निर्बल का,
यही व्यवस्था बदल सके
बने दिशा तेरे कल का।

धन तो बस एक साधन है
जो मौलिक तुझे दिलाये,
पर स्वतंत्र धरा पर तुझको
वोट की पग रखवाए।

उठ रसातल से तू अपने
वोट का मोल समझ ले,
सही-गलत की परख कर फिर
तू स्वतंत्र-अभिव्यक्ति चख ले॥”

Featured post

चल, उचक, चंदा पकड़ लें

IMG-20150602-WA0008
ज़िन्दगी से पल चुरा कर
फिर हंसी की धुन को सुन लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

पक चली उस कल्पना को
रंग-यौवन-रूप फिर दें ।
संकुचित उस सोच के पंखों में
फिर से जान भर दें ।

तर्क के बंधन से उठ कर
बचपने का स्वाद चख लें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

शंका की सीमा हटा,
अद्वितीय कोई काम कर दें ।
जिंदगी की होड़ से
हट कर कोई संग्राम कर दें ।

फिर से जिज्ञासा-पटल पर
साहसी ये पाँव रख दें ।
फिर अधूरा स्वप्न बुन कर
चल उचक चंदा पकड़ लें ॥

Featured post

मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस
चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस

जब चाँद छुपा था बादल में,
था लिप्त गगन के आँगन में,
मैं रात की चादर को ओढ़े
तारों से बातें करती थी ।
मैं नभ के झिलमिल प्रांगण से
सपनों के मोती चुनती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब सूर्य किरण से रूठा था,
प्रकाश का बल भी टूटा था,
मैं सूर्य-किरण के क्षमता की
गाथायें गाया करती थी ।
धागों के बाती बना-बना
जग का अँधियारा हरती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब हरियाली मुरझाई थी,
शुष्कता उनपर छायी थी,
मैं भंगूरित उन मूलों को
पानी से सींचा करती थी ।
पेडों की सूखी छाँवों में
मैं पौधे रोपा करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

जब ईश्वर भक्त से रुष्ट हुआ,
कर्मोँ पर उसके क्रुद्ध हुआ,
निष्ठा की गीली मिट्टी से
विश्वास का पात्र मैं गढ़ती थी ।
मैं आस की कम्पित लौ से भी
श्रद्धा को प्रज्ज्वल करती थी ।
मैं आस की चादर बुनती थी ॥

Featured post

Create a free website or blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: